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ढोरी

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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ढोरी ^१ संज्ञा स्त्री॰ [हिं॰ ढोरना]

१. ढालने का भाव । डरकाने की क्रिया या भाव । उ॰—कनक कलस केसरि भङरि ल्याई डारि दियो हरि पर ढोरी की । अति आनंद भरी ब्रज युवती गावति गीत सबै होरी की ।— सूर (शब्द॰) ।

२. रट । धुन । बान । लो । लगन । उ॰— सूरदास गोपी बड़भागी । हरि वरसन की ढोरी लागी । (ख) ढोरी लाई सुनन की, कहि गोरी मुस्कात । थोरी थोरी सकुच सों भोरी भोरी बात ।— बिहारी (शब्द॰) । क्रि॰ प्र॰—लगना ।

ढोरी ^२ वि॰ [हि॰ ढोरना]

१. ढुरी हुई । ढली हुई ।

२. हिलती ड़ुलती । मत्त । उ॰— ब्रज बनिता बौरी भईँ होरी खेलत आज । रस ढोरी दोरी फिरत भिजवन हैं ब्रजराज ।— ब्रज॰ ग्रँ, पृ॰ ३१ ।