तदूगुण
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प्रकाशितकोशों से अर्थ
[सम्पादित करें]शब्दसागर
[सम्पादित करें]तदूगुण संज्ञा पुं॰ [सं॰] एक अर्थालंकार जिसमें किसी एक वस्तु का अपना गुण त्याग करके समीपवर्ती किसी दूसरे उत्तम पदार्थ का गुण गहण कर लेना वर्णित होता है । जैसे,—(क) अधर धरत हरि के परत ओंठ वीठ पट जोति । हरित बाँस की बाँसुरी इंद्रधनुष सी होती ।—बिहारी (शब्द॰) । इसमें बाँस की बाँसुरी का अपना गुण छोड़कर इंद्रधनुष का गुण ग्रहण करना वर्णित है । (ख) जाहिरै जागत सी जमुना जब बूड़ै बहै उमहैं वह बेनी । त्यों पदमाकर हीर के हारन गंग तरंगन को सुख देनी । पायन के रँग सों रँगि जात सुभाँतिहिं आँति सरस्वति सेनी । पेरे जहाँ ही जहाँ वह बाल तहाँ तहँ ताल में होत त्रिबेनी ।—पद्माकर (शब्द॰) । यहाँ ताल के जल का बालों, हिरे, मोती के हारों और तलवों के संसर्ग के कारण त्रिवेणी का रूप धारण करना कहा गया है ।