तार

विक्षनरी से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

हिन्दी[सम्पादन]

संज्ञा[सम्पादन]

विद्युत को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने हेतु उपयोग किया जाने वाला वस्तु।

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

तार ^१ संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. रूपा । चाँदी ।

२. (सोना, चाँदी ताँबा, लोहा इत्यादि), धातुओं का सूत । तपी धातु को पीट और खींचकर बनाया हुआ तागा । रस्सी या तामे के रूप में परिणत धातु । धातुतंतु । विशेष—धातु को पहले पीटकर गोल बत्ती के रूप में करते हैं । फिर उसे तपाकर जंती के बड़े छेद में डालते और सँड़सी से दूसरी ओर पकड़कर जोर से खींचते हैं । खींचने से धातु लकीर के रूप में बढ़ जाती है । फिर उस छेद में से सूत या बत्ती को निकालकर उससे और छोटे छेद में डालकर खींचते जाते हैं जिससे वह बराबर महीन होता और बढ़ता जाता है । खींचने में धातु बहुत गरम हो जाती है । सोने, चाँदी, आदि धातुओं का तार गोटे, पट्ठे, कारचोबी आदि बनाने के काम आता है । सीसे और राँगे को छोड़ और प्रायः सब धातुओं का तार खींचा जा सकता है । जरी, कारचोबी आदि में चाँदी ही का तार काम में लाया जाता है । तार को सुनहारी बनाने के लिये उसमें रत्ती दो रत्ती सोना मिला देते हैं । क्रि॰ प्र॰—खींचना । यौ॰—तारकश । मुहा॰—तार दबकना = गोटे के लिये तार को पीटकर चिपटा और चौड़ा करना ।

३. धातु का वह तार या डोरी जिसके द्वारा बिजली की सहायता से एक स्थान से दूसरे स्थान पर समाचार भेजा जाता है । टेलिग्राफ । जैसें,—उन दोनों गाँवों के बीच तार लगा है । उ॰—तडित तार के द्वार मिल्यौ सुभ समाचार यह ।—भारतेंदु ग्रं॰, भा॰ २, पृ॰, ८०० । क्रि॰ प्र—लगाना ।—लगाना । यौ॰—तारघर । विशेष—तार द्वारा समाचार भेजने में बिजली और चुंबक की शक्ति काम में लाई जाती है । इसके लिये चार वस्तुएँ आवश्यक होती हैं—बिजली उत्पन्न करनेवाला यंत्र या घर, बिजली के प्रवाह का संचार करनेवाला तार, संवाद को प्रवाह द्वारा भेजनेवाला यंत्र और संवाद को ग्रहण करनेवाला यंत्र । यह एक नियम है कि यदि किसी तार के घेरे में से बिजली का प्रवाह हो रहा हो और उसके भीतर एक चुंबक हो, तो उस चुंबक को हिलाने से बिजली के बल में कुछ परिवर्तन हो जाता है । चुंबक के रहने से जिस दिशा को बिजली का प्रवाह होगा, उसे निकाल लेने पर प्रवाह उलटकर दूसरी दिशा की ओर हो जायगा । प्रवाह के इस दिशापरिवर्तन का ज्ञान कंपास की तरह के एक यंत्र द्वारा होता है जिसमें एक सुई लगी रहती है । यह सुई एक ऐसे तार की कुंडली के भीतर रहती है जिसमें बाहर से भेजा हुआ विद्युत्प्रवाह संचरित होता है । सुई के इघर उधर होने से प्रवाह के दिक् परिवर्तन का पता लगाता है । आजकल चुंबक की आवश्यकता नहीं पड़ती । जिस तार में से बिजली का प्रवाह जाता है, उसके बगल में दूसरा तार लगा होता है जिसे विद्युद् घट से मिला देने से थोड़ी देर के लिये प्रवाह की दिशा बदल जाती है । अब समाचार किस प्रकार एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाता हैं, स्थूल रूप से यह देखना चाहिए । भेजनेवाले तारघर में जो विद्युद् घटमाला होती है, उसके एक ओर का तार तो पृथ्वी के भीतर गड़ा रहता है और दूसरी ओर का पानेवाले स्थान की ओर गया रहता है । उसमें एक कुंजी ऐसी होती है जिसके द्वारा जब चाहें तब तारों को जोड़ दें और जब चाहें तब अलग कर दें । इसी के साथ उस तार का भी संबंध रहता है जिसके द्वारा बिजली के प्रवाह की दिशा बदल जाती है । इस प्रकार बिजली के प्रवाह की दिशा को कभी इधर कभी उधर फेरने की युक्ति भेजनेवाले के हाथ में रहती है जिससे संवाद ग्रहण करनेवाले स्थान की सुई को वह जब जिधर चाहे, बटन या कुंजी दबाकर कर सकता है । एक बार में सुई जिस क्रम से दाहिने या बाएँ होगी, उसी के अनुसार अक्षर का सकेत समझा जायगा । सुई के दाहिने घूमने को डाट (बिंदु) और बाएँ घूमने को डैश (रेखा) कहते हैं । इन्हीं बिदुओं और रेखाओं के योग से मार्स नामक एक व्यक्ति ने अँगरेजी वर्णामाला के सब अक्षरों के संकेत बना लिए हैं । जैसे,— A के लिये ॰— B के लिये — ॰ ॰ ॰ D ले लिये —॰—॰ इत्यादि । तार के संवाद ग्रहण करने की दो प्रणालियाँ हैं—एक दर्शन प्रणाली, दूसरी श्रवण प्रणली । ऊपर लिखी रीति पहल ी प्रणाली के अंतर्गत है । पर अब अधिकतर एक खटके (Sounder) का प्रयोग होता है जिसमें सुई लोहे के टुकड़ों पर मारती है जिससे भिन्न भिन्न प्रकार के खट खट शब्द होते हैं । अभ्यास हो जाने पर इन खट खट शब्दों से ही सब अक्षर समझ लिए जाती हैं ।

४. तांर से आई हुई खबर । टेलिग्राफ के द्वारा आया हूआ समाचार । क्रि॰ प्र॰—आना ।

५. सूत । तागा । तंतु । सूत्र । यौ॰—तार तोड़ । मुहा॰—तार तार करना = किसी बुनी या बटी हुई वस्तु की धज्जियाँ अलग अलग करना । नोचकर सूत सूत अलग करना । उ॰—तार तार कीन्हीं फारि सारी जरतारी की ।—दिनेश (शब्द॰) । तार तार होना = ऐसा फटना कि धज्जियाँ अलग अलग हो जायँ । बहुत ही फट जाना ।

६. सुतड़ी (लश॰) ।

७. बराबर चलता हुआ हम । अखंड परंपरा । सिलासिला । जैसे,—दोपहर तक लोगों के आने जाने का तार लगा रहा । मुहा॰—तार टूटना = चलता हुआ क्रम बंद हो जाना । परंपरा खंडित हो जाना । लगातार होते हुए काम का बंद हो जाना । तार बँधना = किसी काम का बराबर चला चलना । किसी बात का बराबर होते जाना । सिलसिला जारी होना । जैसे,—सबेरे से जो उनके रोने का तार बँधा, वह अब तक न टूटा । तार बाँधना = (किसी बात को) बराबर करते जाना । सिलसिला जारी करना । तार लगाना = दे॰ 'तार बाँधना' । तार ब तार = छिन्न भिन्न । अस्त व्यस्त । बेसिलसिले ।

७. ब्योंत । सुबीता । व्यवस्था । जैसे,—जहाँ चार पैसे का तार होगा वहाँ जायँगे, यहाँ क्यों आवेंगे । मुहा॰—तार बैठना या बँधना = ब्योंत होना । कार्यसिद्धि का सुघीता होना । तार लगना = दे॰ 'तार बैठना' । तार जमना = दे॰ 'तार बैठना' ।

८. ठीक माप । जैसे,—(क) अपने तार का एक जूता ले लेना । (ख) यह कुरता तुम्हारे तार का नहीं है ।

९. कार्यसिद्धि का योग । युक्ति । ढब । जैसे,—कोई ऐसा तार लगाओ कि हम भी तुम्हारे साथ आ जायँ । यौ॰—तारघाट ।

१०. प्रणव । ओंकार ।

११. राम की सेना का एक बंदर जो तारा का पिता था और बृहस्पति के अंश से उत्पन्न था ।

१२. शुद्ध मोती ।

१३. नक्षत्र । तारा । उ॰—रवि के उदय तार भौ छीना । चर वीहर दूनों महँ लीना ।—कबीर बी॰, पृ॰ १३० ।

१४. सांख्य के अनुसार गौण सिद्धि का एक भेद । गुरु से विधिपूर्वक वेदाध्ययन द्वारा प्राप्त सिद्धि ।

१५. शिव ।

१६. विष्णु ।

१७. संगीत में एक सप्तक (सात स्वरों का समूह) जिसके स्वरों का उच्चारण कंठ से उठकर कपाल के आभ्यंतर स्थानों तक होता है । इसे उच्च भी कहते है ।

१८. आँख की पुतली ।

१९. अठारह अक्षरों का एक वर्णवृत्त । जैसे,—तह प्रान के नाथ प्रसन्न बिलोकी ।

२०. तौल । उ॰—तुलसी नृपहि ऐसी कहि न बुझावै कोउ पन और कुँअर दोऊ प्रेम की तुला धों तारु ।—तुलसी (शब्द॰) ।

२१. नदी का तट । तीर । विशेष—दिशावाचक शब्दों के साथ संयोग होने पर 'तीर' शब्द 'तार' बन जाता है । जैसे दक्षिणतार ।

२२. मोती की शुभ्रता या स्वच्छता (को॰) ।

२३. सुंदर या बड़ा मोती (को॰) ।

२४. रक्षा (को॰) ।

२५. पारगमन । पार जाना (को॰) ।

२६. चाँदी (को॰) ।

२७. बीज का भांड (विशेषतः कमल का) ।

तार पु ^२ संज्ञा पुं॰ [सं॰ ताल]

१. ताल । मजीरा । उ॰—काहू के हाथ अधोरी काहू के बीन, काहू के मृदंग, कोऊ गहे तार ।—हरिदास (शब्द॰) ।

२. करताल नामक बाजा ।

तार पु ^३ संज्ञा पुं॰ [सं॰ तल] तल । सतह । जैसे, करतार । उ॰— सोकर माँगन को बलि पै करतारहु ने करतार पसारयो ।— केशव (शब्द॰) । यौ॰—करतार = हथेली ।

तार पु ^४ संज्ञा पुं॰ [हिं॰ ताडु]

१. कान का एक गहना । ताटंक । तरौना । उ॰—श्रवनन पहिरे उलटे तार ।—सूर (शब्द॰) ।

तार पु ^५ संज्ञा पुं॰ [सं॰ ताल, ताड] ताड़ नामक वृक्ष । उ॰— कीन्हेसि बनखंड औ जरि मूरी । कीन्हेसि तरिवर तार खजूरी ।—जायसी (शब्द॰) ।

तार ^६ वि॰ [सं॰]

१. जिसमें से किरनें फूटी हों । प्रकाशयुक्त । प्रकाशित । स्पष्ट ।

२. निर्मल । स्वच्छ ।

३. उच्च । उदात्त । जैसे, स्वर (को॰) ।

४. अति ऊँचा । उ॰—जिम जिन मन अमले कियइ तार चढंती जाइ ।—ढोला॰, दू॰ १२ ।

५. तेज । उ॰—माह वद्दि पंचमि दिवस चढ़ि चलिए तुर तार ।—पृ॰ रा॰ २५ ।२२५ ।

६. अच्छा । उत्तम । प्रिय (को॰) ।

७. शुद्ध । स्वच्छ (को॰) ।

तार पु ^७ संज्ञा पुं॰ [हिं॰] दे॰ 'तारा' । उ॰—अव्वल ओ मारफत हासिल न पावे । दोयम तार के दिल गुमराह होवे ।— दक्खिनी॰, पृ॰ ११४ ।

तार पु ^८ अव्य॰ [सं॰ तार(= तीव्र, पतला)] किंचिन्मात्र । जरा भी । उ॰—भाँगउ खारा खून कर तू आण न उर तार ।—बाँकी॰ ग्रं॰, भा॰ १, पृ॰ ७५ ।

तार ^९ संज्ञा पुं॰ [हिं॰] दे॰ 'ताल' । उ॰—बाजत चट सों पटरी तारन ग्वारन गावत संग ।—नंद॰ ग्रं॰, पृ॰ ३८८ ।

तार कमानी संज्ञा स्त्री॰ [फा़॰ तार + कमानी] धनुष कै आकार का एक औजार । विशेष—इसमें डोरी के स्थान पर लोहे का तार लगा रहता है । इससे नगीने काटे जाते हैं ।

तार तार ^१ वि॰ [हिं॰ तार] जिसकी धज्जियाँ अलग अलग हो गई हों । टुकड़ा टुकड़ा । फटा कटा । उधड़ा हुआ । क्रि॰ प्र॰—करना ।