तिल्ली

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

तिल्ली ^१ संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ तिलक, तुलनीय अ॰ तिहान (=तिल्की)] पेन के भीतर का अवयव जो मांस की पोली गुठली के आकार का होता है और पसलियों कै नीचे पैठ की बाईँ ओर होता है । विशेष—इसका संबंध पाकाशय से होता है । इसमें खाए हुए पदार्थ का विशेष रस कुछ काल तक रहता है । अबतक यह रस रहता है, तबतक तिल्ली फैदकर कुछ बढ़ी हुई रहती है, फिर जब इस रस को रक्त सोच लेता है, तब वह फिर ज्यों की त्वों हो जाती है । तिस्वी में पहुँचकर रक्तकशिकाओं का रंग बैंगली हो जाता है । ज्वर के कुछ काल तक रहने से तिल्ली बढ़ जाती है, उसमें रक्त आधिक आ जाता है और कभी कभी छूने से पीड़ा भी होती है । ऐसी अवस्था में उसे छेदने से उसमें से लाल रक्त निकलता है । ज्वर आदि के कारण बार बार अधिक रक्त आते रहने से ही तिल्ली बढ़ती है । इस रोग में मनुष्य दिन दिन दुबला होता जाता है, उसका मुँह सुखा रहता है और पेट निकल आता है । वैद्यक के अनुसार जब दाहकारक तथा कफकारक पदार्थों के विशेष सेवन से रुधिर कुपित होकर कफ द्वारा प्लीहा को बढ़ाता है, तब तिल्ली बढ़ आती है और मंदाग्नि, जीर्ण ज्वर आदि रोग साथ जग जाने हैं । जवाखार, पलास, का क्षार, शंख की भस्म आदि प्लीहा की आयुर्वेदोक्त औषध हैं । डक्टरी में तिल्ली बढ़ने पर कुनैन तथा आर्सेनिक (संखिया) और लोहा मिली हुई दवाएँ दी जाती है । पर्या॰—प्लीहा । पिलही ।

तिल्ली ^२ संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ तिल] तिल नाम का अन्न या तेलहन । वि॰ दे॰ 'तिल' ।

तिल्ली ^३ संज्ञा स्त्री॰ [देश॰] एक प्रकार का बाँस जो आसाम और बरमा में ऊँची पहाड़ियों पर होता है । विशेष—ये बाँस पचास साठ फुट तक ऊँचे होते हैं और इसमें बाँठे दुर दुर पर होती है, इससे ये चोंगे बनाने के काम में अधिक आते हैं ।

तिल्ली ^४ संज्ञा स्त्री॰ [हिं॰] दे॰ 'तीली' ।