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त्रिभङ्ग

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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त्रिभंग ^१ वि॰ [सं॰ त्रिभङ्ग] तीन जगह से टेढ़ा । जिसमें तीन जगह बल पड़ते हों । उ॰—जैसे को तैसो मिले तब ही जुरत सनेह । ज्यों त्रिभंग तनु स्याम को कुटिल कूबरी देह ।— पझाकर (शब्द॰) ।

त्रिभंग ^२ संज्ञा पुं॰ खड़े होने की एक मुदा जिसमें पेट कमर और गरदन में कुछ टेढ़ापन रहता है । विशेष—प्राय: श्रीकृष्ण के ध्यान में इस प्रकार खड़े होकर बंसी बजाने की भावना की जाती है ।