त्रिभङ्गी
प्रकाशितकोशों से अर्थ
[सम्पादित करें]शब्दसागर
[सम्पादित करें]त्रिभंगी ^१ वि॰ [सं॰ त्रिभङ्गिन्] तीन जगह से टेढ़ा । तीन मोड़ का । त्रिभंग । उ॰—करौ कुबत जग कुटिलता, तजौं न दीन दयाल । दुखी होहुगे सरल हिय बसत त्रिभंगी लाल ।— बिहारी (शब्द॰) ।
त्रिभंगी ^२ संज्ञा पुं॰
१. ताल के साठ मुख्य भेदों में से एक भेद जिसमें एक गुरु, एक लघु और एक प्लुत मात्रा होती है ।
२. शुद्ध राग का एक भेद ।
३. एक मात्रिक छंद जिसके प्रत्येक चरण में ३२ मात्राएँ होती हैं और १०, ८, ८, ६, मात्राओं पर यति होती है । जैसै—परसद पद पावन, शोक नसावन, प्रगट भई तप पुंज सही ।
४. गणत्मक दंडक का भेद जिसके प्रत्येक चरण में ६ नगण, २ सगण, भगण मगण, सगण और अंत में एक गुरु होता है अर्थात् प्रत्येक चरण में ३४ अक्षर होते हैं । जैसे—सजल जलद तनु लसत विमल तनु श्रम कण त्थों झलकों हैं उमगो है बुंद मनो है । भ्रुव युग मटकनि फिरि लटकनि आनिमिष नैनन जो है हरषो है ह्लैँ मन मोहै ।
५. दे॰ 'त्रिभंग' ।