दंडक

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

दंडक संज्ञा पुं॰ [सं॰ दण्डक]

१. डंडा ।

२. दंड देनेवाला पुरुष । शासक ।

३. छंदों का एक वर्ग । वह छंद जिसमें वर्णों की संख्या २६ से अधिक हो । विशेष—दंडक दो प्रकार का होता है, एक गणात्मक, दूसरा मुक्तक । गणात्मक वह है जिसमें गणों का बंधन होता है अर्थात् किस गण के उपरांत फिर कौन सा गण आना चाहिए, इसका नियम होता है । जैसे, कुसुमस्तक, त्रिभंगी, नीलचक्र इत्यादि । उ॰—(नीलचक्र) । जानि कै समै भवाल, रामराज साज साजि ता समै अकाज काज कैकई जु कीन । भूप तें हराय बैन राम सीय बंधु युक्त बोलिकै पठाय बेगि कानन सुदीन ।—(शब्द॰) । मुक्तक वह है जिसमें केवल अक्षरों की गिनती होती है अर्थात् जो गणों के बंधन से युक्त होता है । किसी किसी में कहीं कहीं लघु गुरु का नियम होता है । हिंदी काव्य में जो कवित्त (मनहर) और घनाक्षरी छंद अधिक व्यवहत हुए हैं वे इसी मुक्तक के अंतर्गत हैं । उ॰—(मनहर कवित्त) । आनँद के कंद जग ज्यावन जगतबंद दशरथनंद के निबाहेई निबहिए । कहै पद्माकर पवित्र पन पालिबे कों चोरे, चक्रपाणि के चरित्रन कों चहिए ।—पद्माकर ग्रं॰, पृ॰ २३८ ।

४. इक्ष्वाकु राजा के पुत्र का नाम । विशेष—ये शुक्राचार्य के शिष्य थे । इन्होंने एक बार गुरु की कन्या का कौमार्य भंग किया । इसपर शुक्राचार्य ने शाप देकर इन्हें इनके पुर के सहित भस्म कर दिया । इनका देश जंगल हो गया और दंडकारण्य कहलाने लगा ।

५. दंडकारण्य ।

६. एक प्रकार का वातरोग जिसमें हाथ, पैर, पीठ, कमर आदि अंग स्तब्ध होकर एंठ से जाते हैं ।

७. शुद्ध राग का एक भेद ।

८. हल में लगनेवाली एक लंबी लकड़ी । हरिस (को॰) ।