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दत्तात्रेय

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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दत्तात्रेय संज्ञा पुं॰ [सं॰] एक प्रसिद्ब प्राचीन ऋषि जो पूराणानुसार विष्णु के चौबीस अवतारों में से एक माने जाते हैं । विशेष—मार्कड़ेय पुराण में इनकी उत्पत्ति के संबंध में जो कथा लिखी है वह इस प्रकार है—एक कोढी़ ब्रह्मण की स्त्री बड़ी पतिव्रता और स्वामिभक्त थी । एक बार वह ब्राह्मण एक वेश्या पर आसक्त हो गया । उसके आज्ञानुसार उसकी पतिव्रता स्त्री उसे अपने कंधे पर बैठा कर अँधेरी रात में उस वेशया के घर चली । रास्ते में मांडव्य ऋषि तपस्या कर रहे थे; अँधेरे में कोढी़ ब्राह्मण का पैर उन्हें लग गया । उन्होंने शाप दिया कि जिसका पैर मुक्ते लगा है सूर्य निकलते निकलते वह मर जायगा । सती स्त्री ने अपने पति की रक्षा करने और वैधव्य से बचने के लिये कहा कि जाओ सूर्य उदय ही न होगा । जब सूर्य का उदय न हुआ और पृथ्वी के नाश की संभावना हुई तब सब देवता मिलकर ब्रह्मा के पास गए । ब्रह्मा ने उन्हे अत्रि मुनि की स्त्री अनसूया के पास जाने की संमति दी । देवताओं के प्रार्थना करने पर अनसूया ने जाकर ब्राह्मण पत्नी की समझाया और कहा कि तूम सूर्योदय होने दो तुम्हारे पति के मरते ही मैं उन्हें फिर सजीव कर दूँगी और उनका शरीर भी नीरोग हो जायगा । इसपर वह मान गई, तब सूर्य उदय हुआ और मृत ब्राह्मण को अनसूया ने फिर जीवित कर दिया । देवताओं ने प्रसन्न होकर अनसुया से वर माँगने के लिये कहा । अनसूया ने कहा—ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों मेरे गर्भ से जन्म ग्रहण करें । ब्रह्मा ने इसे स्वोकार किया; और तदनुसार ब्रह्मा ने सोम बनकर, विष्णु ने दत्तात्रेय बनकर, और महेश्वर ने दुर्वासा बनकर अनसूया के घर जन्म लिया । हैहयराज ने जब अत्रि को बहुत कष्ट पहुँचाया था तब दत्तात्रेय क्रुद्ध होकर सातवें ही दिन गर्भ से निकल आए थे । ये बड़े भारी योगी थे और सदा ऋषिकुमारों के साथ योगसाधन किया करते थे । एक बार ये अपने साथियों और संसार से छुटकारा पाने के लिये बहुत समय तक एक सरोवर में ही ड़ूबे रहे फिर भी ऋषिकुमारों ने उनका संग न छोड़ा वे सरोवर के किनारे उनके आसरे बैठे रहे । अंत में दत्तात्रेय उन्हें छलने के लिये एक सुंदरी को साथ लेकर सरोबर से निकले और मद्दापान करने लगे । पर ऋषिकुमारों ने यह समझकर तब भी उनका संग न छोड़ा कि ये पूर्ण योगीश्वर है, इनकी आसक्ति किसी विषय में नहीं है । भागवत के अनुसार हन्होंने चौबीस पदार्थो से अनेक शिक्षाएँ ग्रहण की थीं और उन्हीं चौबीस पदार्थो को ये अपना गुरु मानते थे । वे चौबीस पदार्थ ये हैं—पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, चंद्रमा, सूर्य, कबूतर, अजगर, सागर, पतंग, मधुकर (भौरा और मधुमक्खी), हाथी, मधुहारी (मधुसंग्रह करनेवाली), हरिन, मछली, पिंगला वेश्या, गिद्ध, बालक, कुमारी कन्या. बाण बनानेवाला, साँप, मकड़ी और तितली ।