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दुपहरिया

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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दुपहरिया संज्ञा स्त्री॰ [हिं॰ दुपहर + इया (प्रत्य॰)] †

१. मध्याह्न का समय । दोपहर ।

२. एक छोटा पौधा जो फूलों के लिये लगाया जाता है । उ॰—पग पग मग अगमन परति चरन अरुन दुति झूलि । ठौर ठौर लखियत उठे दुपहरिया से फूलि ।—बिहारी (शब्द॰) । विशएष—यह पौधा डेढ़ दो हाथ ऊँचा और एक सीधे खड़े डंठल के रूप में होता है । इसमें शाखाएँ या टहनियाँ नहीं फूटती । पत्तियाँ इसकी आठ दस अंगुल लंबी, अँगुल डेढ़, अंगुल चौड़ी और किनारे पर कटावदार तथा गहरे रंग की होती हैं । फूल इसके गोल कटोरे के आकार के और गहरे लाल रंग के होते हैं । इन फूलों में पाँच दल होते हैं । फूलों के झड़ जाने पर जो बीजकोश रह जाता है उसमें रोई के दान से काले काले बीज पड़ते हैं । वैद्यक में दुपहरिया मलरोधक, कुछ गरम, भारी कफकारक, ज्वरनाशक तथा वात पित्त को दूर करनेवाली मानी जाती है । पर्या॰—बंधूक । बंधुजीव । रक्त । माध्याह्निक । बंधुर । सूर्य- भक्त । ओष्ठपुष्प । अर्कवल्लभ । हरिप्रिय । शरत्पुष्प । ज्वरध्न । सुपुष्प ।

३. वह जिसका गर्भाधान दुपहरिया को हुआ हो । हरामजादा । दुष्ट । पाजी । (बाजारू) ।