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दुरिष्ट

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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दुरिष्ट संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. पाप । पातक । विशेष—उशना की स्मृति में पातकों को दुरिष्ट और उपपातकों को दुरित कहा गया है ।

२. वह यज्ञ जो मारण, मोहन, उच्चाटन आदि अभिचारों के लिये किया जाय । विशेष—स्मृति पुराण आदि में ऐसा यज्ञ करना महापाप लिखा है । विष्णुपुराण में लिखा है कि देवता, ब्राह्मण और पितरों से द्वेष करनेवाला, दुरिष्ट यज्ञ करनेवाला, कृमिभक्ष और कृमीश नरक में जाते हैं ।