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दृढ़पद

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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दृढ़पद संज्ञा पुं॰ [सं॰ दृढपद] तेईस मात्राओं का एक मात्रिक छंद जिसमें १३ और १० मात्राओं पर विश्राम होता है और अंत में दो गुरु होते हैं । इसे उपमान भी कहते हैं । जैसे,—बाहु बंध करमूल में आछावलि राजै । लपटे फणि श्रीखंड की लतिका जनु राजै । कुंड जु रच्यौ सुहोम को, जनु नाभि सुहाई । रोमावलि मिस धूम की रेखा चलि आई ।