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दृष्टिवाद

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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दृष्टिवाद संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. वह सिंद्धात जिसमें दृष्टि या प्रत्यक्ष प्रमाण ही की प्रधानता हो ।

२. जैनियों के बारह अंगों में से एक जिसकी रचना गणधर लोग तीर्थकरों के उपदेशों को लेकर करते हैं । विशेष—ये /??/ धर्म के मूल ग्रंथ है । ग्यारह अंग तो मिलते हैं पर यह दृष्टिवाद नहीं मिलता । जैनाचार्य सक ल कीर्ति रचित 'तत्वार्थसारदीपक' में इसका जो उल्लेख मिलता है उससे पाया जाता है कि इसमें चंद्र, सूर्य आदि की गति आयु आदि, प्रणापान चिकित्सा, मंत्र, तंत्र तथा अनेक प्रकार के विषय संमिलित हैं ।