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देवीभागवत

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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देवीभागवत संज्ञा पुं॰ [सं॰] एक पुराण जिसकी गणना बहुत से लोग उपपुराणों में और कुछ लोग पुराणों में करते हैं । विशेष—श्री मदभागवत के समान इस पुराण में भी बारह स्कंध और १८०००श्लोक हैं । अतः इसका निर्णय कठिन है कि कौन पुराण है और कौन उपुपराण । पुराणों में एक दूसरे का विषय, श्लोक संख्या आदि दी हुई है जिसके अनुसार पुराणों की प्रामाणिकता का प्रायः निर्णय किया जाता है । मत्स्यपुराण में लिखा है कि 'जिस ग्रंथ में गायत्री का अवलंवन करके पर्मतत्व का सविस्तर वर्णन है और वृत्रासुर के वध का पूरा वृतांत हो, जिसमें सारस्वत कल्प के बीच नरों और देवताओं की कथा हो - - - और १८००० श्लोक हों, वही भागवत पुराण है । शैव पुराण के उत्तर खंड में लिखा है कि जिसमें भगवती दुर्गा का चरित्र हो वह भागवत है, देवी पुराण नहीं' । इसी प्रकार की ध्यवस्था कालिका नामक उपपुराण में भी दी है । यह तौ शैव और शाक्त पुराणों का साक्ष्य हुआ । अब वैष्णव पुराणों की व्यवस्था सुनिए । पद्यपुराण में लिखा है कि सब पुराणों में श्रीमद्भागवत श्रेष्ठ है, जिसमें प्रति पद में ऋषियों द्वारा कहा हुआ कृष्ण का महात्म्य है । इस कथा को परीक्षित की सभा में बैठकर शुकदेव जी ने कहा था' । नारद पुराण में भागवत उसको कहा गया है, जिसके दशम स्कंध में कृष्ण का बाल और कौमारचरित्, ब्रज में स्थिति, किशोरवस्था में मथुरावास, यौवन में द्वारकावास और भूभारहरण आदि विषय हों । देवी भागवत में प्रथम ही त्रिपदा गायत्री है किंतु विष्णु भागवत में नहीं, उसमें केवल 'धीमहि' इतना ही पद आया है । वृत्रासुर के वध की कथा दोनों में है । पर मत्स्यपुराण में बतलाया हुआ सारस्वतकल्प प्रसंग विष्णुभागवत में नहीं है, उसमें पाद्यकल्पप्रसंग है । मत्स्यपुराण में जो लक्षण दिया हुआ हैं उसमें सांप्रदायिक भाव की गंध नहीं जान पड़ती । शैव और वैष्णव विद्वानों में इन दोनों पुराणों के विषय में बहुत दिनों तक झगडा़ चलता रहा । दुर्जनमुखचपोटिका, दुर्जनमुखमहाचपेटिका, दुर्जनमुखपदपद्यपादुका आदि कई ग्रंथ इस विवाद में लिखे गए । बात यह है कि ये दोनों पुराण सांप्रदायिक विशेषताओं से परिपूर्ण हैं । ऐसा जान पड़ता है कि भागवत नाम का कोई प्राचीन पुराण था, जो लुप्त हो गया था । बौद्ध धर्म के उपरांत हिंदूधर्म की जब फिर नए रूप में स्थापना हुई और शैवों वैष्णवों की प्रबलता हुई तब पुराणों में दिए गए लक्षण के अनुसार वैष्णव पंडितों ने श्रीमदभागवत की और शैव पडितों ने देवी भागवत की रचना की । रचना के विचार से यदि देखा जाय तो देवी भागवत की शैली अधिक अनुकूल और भागवत की शैली पांडित्यपूर्ण काव्य की शैली को लिए हुए है । जिस प्रकार श्रीमदभागवत में दार्शनिक भावों की प्रधानता है उसी प्रकार देवी भागवत में तांत्रिक भावों की है । इसमें देवी के गिरिजा, काली, भद्रकाली, महामाया आदि रुपों की उपासना की गई है । पार्वती के पीठस्थानों का वर्णन है । भैरव और वैताल विधि की उत्पत्ति, और उनकी पूजा की विधि बतलाई गई है । यहाँ तक की इसमें आसाम देंश के कामरूप देश और कामाक्षी देवी का बडे़ विस्तार के साथ वर्णन है । अस्तु, अपने वर्तमान रूप में देवी भागवत ईसा की ९ वी॰ और ११ वी शताब्दी के बीच बना होगा ।