द्विपदी
प्रकाशितकोशों से अर्थ
[सम्पादित करें]शब्दसागर
[सम्पादित करें]द्विपदी संज्ञा स्त्री॰ [सं॰]
१. वह छंद या वृत्ति जिसमें दो पद हों ।
२. दो पदों का गीत ।
३. एक प्रकार का चित्र काव्य जिसमें किसी दोहे आदि को कोष्ठों की तीन पंक्तियों में लिखते हैं । विशेष— यह चित्रकाव्य इस प्रकार लिखते हैं कि दोहे के पहले चरण का आदि अक्षर पहले कोठे में, फिर एक एक अक्षर छोड़कर पहली पंक्ति के कोठों में भरते हैं, इसके, उपरांत छूटे हुए अक्षरों को दूसरी पंक्ति के काठों में एक एक करके रख देते हैं । इसी प्रकार तीसरी पंक्ति के कोठों में दोहे के दूसरे चरण के अक्षर, एक एक अक्षर छोड़ते हुए, रखते हैं । इन्हीं तीन कोष्ठ पंक्तियों से पूरा दीहा पढ़ लिया जाता है । पढ़ने का क्रम यह होना चाहिए कि पहले कोठे के अक्षर को पढ़कर उसके नीचेवाले कोठे के अक्षर को पढे़, फिर पहली पंक्ति के दूसरे अक्षर को पढ़कर उसके नीचे के (दुसरी पंक्ति के दूसरे) कोठे के अक्षर को पढे़ । तीसरी पंक्ति के कोठों के अक्षरों को नीचे से ऊपर इस क्रम से पढे़ अर्थात् प्रथम द्वितीय कोष्ठ के क्रम से पढ़कर फिर तृतीय द्वितीय कोष्ठ के अक्षरों को पढे़, जैसे,— /?/ रामदेव नरदेव गति, परशु धरन मद धारि । वामदेव गुरदेव गति पर कुधरन हद धारि ।