धर्मध्वज
प्रकाशितकोशों से अर्थ
[सम्पादित करें]शब्दसागर
[सम्पादित करें]धर्मध्वज संज्ञा पुं॰ [सं॰]
१. धर्म का आडंबर खड़ा करके स्वार्थ साधनेवाला मनुष्य । धार्मिकों का सा वेश और ढंग बनाकर लोगों से पुजानेवाला मनुष्य । पाखंड़ी । उ॰—धिक धर्मध्वज धधक धोरी ।—तुलसी (शब्द॰) ।
२. मिथिला के एक जनक- वंशीय राजा जिनकी कथा महाभारत के शांतिपर्व में है । ये संन्यासधर्म और मोक्षधर्म के जाननेवाले परम ब्रह्मज्ञानी राजा थे । विशेष—एक बार सुलभा नाम की एक संन्यासिनी सारी पृथ्वी पर घूमती हुई धर्मध्वज की परीक्षा के लिये उनकी सभा में योगबल से अत्यंत मनोहर रूप धारण करके आई । राजा चकित होकर उसका परिचय आदि पूछ ही रहे थे कि उसन े अपनी बुद्बि द्बारा राजा की बुद्बि में और नेत्र द्बारा राजा के नेत्र में यह देखने के लिये प्रवेश किया कि वे मोक्षधर्म के वेत्ता है या नहीं । राजा उसका अभिप्राय समझ गए और लिंग शरीर धारण करके उससे उसका परिचय पूछने लगे और उसे उसके आचरण के लिये भला बुरा कहने लगे । राजा ने कहा—'तुमने अपनी बुद्बि द्बारा जो हमारे शरीर में प्रवेश किया उससे अनुचित सहयोग हुआ, इससे तुम्हें तो व्यभिचार द्बोष लगा ही,मैं भी उसका भागी हुँगा' । सुलभा ने आत्मज्ञान की अनेक बातें कहकर राजा को इस प्रकार समझया—'मेरा संपर्क तो अपने शरीर के साथ नहीं है, आपके शरीर के साथ क्योंकर हो सकता है? मैंने अपने सत्वगुण के बल से आपके शरीर में प्रवेश किया । यदि आप जीवन्मुक्त हैं तो मेरे प्रवेश से आपका कोई अपकार नहीं हो सकता । वन के बीच शून्य कुटी में प्रवेश करना संन्यासी का धर्म है अतः मैंने भी आपके बेधशून्य शरीर में प्रवेश किया है और आज भर रहकर कल चली जाउँगी । राजा यह सुनकर चुप हो रहे ।