धर्मपरिणाम
प्रकाशितकोशों से अर्थ
[सम्पादित करें]शब्दसागर
[सम्पादित करें]धर्मपरिणाम संज्ञा पुं॰ [सं॰] योग दर्शन के अनुसार सब भूतों और इंद्रियों के रूप या स्थिति से दूसरे रूप या स्थिति में प्राप्त होने की वृत्ति । एक धर्म के नेवृत्त होने पर दुसरे धर्म की प्राप्ति । जैसे, मिट्टी के पिंडतारूप धर्म के निवृत्त होने पर घटत्वरूप धर्म की प्राप्ति । विशेष—पतंजलि ने अपने योगदर्शन में चित्त के जिस प्रकार निरोध, समाधि और एकाग्रता ये तीन परिणाम कहे हैं उसी प्रकार सूक्ष्म, स्थूल भूतों तथा इंद्रियों के भी तीन परिणाम बतलाए हैं ।—धर्मपरिणाम, लक्षणपरिणाम और अवस्थापरिणाम । पुरुष के अतिरिक्त और सब वस्तुएँ इन परिणामों के अधीन अर्थात् परिणामी हैं । प्रत्येक धर्मी अर्थात् प्राकृतिक द्रव्य तीन प्रकार के धर्मो से युक्त हैं ।—शांत, उदित और अव्यपदेश्य । वस्तु का जो धर्म अपना व्यापार कर चुका हो, वह शांतधर्म कहलाता है । जैसे, धट के फूट जाने पर घटत्व बीज के अंकुरित हो जाने पर बीजत्व । जो धर्म विद्यमान रहता है उसे उदित कहते है, जिसे, घट के बने रहने पर घटत्व । जो धर्म प्राप्त । होनेवाला है और व्यक्त या निदिंष्ट न हो सकने पर भी शक्ति रूप से स्थित या निहित रहता है उसे लब्ययदेश्य कहते हैं, जैसे बीज में वृक्ष होने का धर्म ।