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धीजना

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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धीजना क्रि॰ स॰ [सं॰ /? धृ, धार्य्य, धैर्य्य]

१. ग्रहण करना । स्वीकार करना । अंगीकार करना । उ॰— (क) पाती लै के चल्यो विप्र छिप्रवहि पुरी गयो, नयो चाव जान्यो एपै कैसे तिया धीजिए । कहौ तुम जाइ रानी बैठी सत आई मोको बौल्यो न सोहाय प्रभु सेवा माँझ भीजिए ।— प्रियादास (शब्द॰) । (ख) धरिया कूँ धीजूँ नीहं गहूँ अधर की बाहिं । धरिय अधर पहिचानियाँ तौ कछू धऱावहि नाहिं ।—कबीर (शब्द॰) ।

२. धीरज धरना । धैर्य युक्त होना । उ॰— आय मिली अलिन में, लालन की ध्यान हिये, पिये मद मानो गृह आई तब धीजो है ।—प्रियादास (शब्द॰) ।

३. अति प्रसन्न होना । संतुष्ट होना । उ॰— (क) धरे सब जाय प्रभु सुकर बनाय दियो कियो सरबोपरि लै चल्यो मति धीजिए ।—प्रियादास (शब्द॰) । (ख) उज्वल देखि न धीजिए वग ज्यो माँडे़ ध्यान । धौरे बैठि चपैटि सी यों लै बूड़ै़ ज्ञान ।—कबीर (शब्द॰) ।