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धूम२

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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धूम२ संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ धूम ( = धूआँ)]

१. बहुत से लोगों के इकट्ठे होने, आने जाने, शोर गुल करने, हिलने डोलने आदि का व्यापार । रेलपेल । हलचल । अंदोलन । जैसे, मेले तमाशे की धूम, उत्सव की धूम । लूटमार की धूम । क्रि॰ प्र॰—मचना ।—मचाना ।

२. हल्ला और उछल कूद । उपद्रव । उत्पात । ऊधम । जैसे,—यहाँ धूम मत मचाओ, और जगह खेलो । उ॰—बंदर की तरह धूम मचाना नहीं अच्छा ।—हरिश्चंद्र (शब्द॰) । मुहा॰—धूम डालना = ऊधम करना । हल्ला गुल्ला करना । उ॰—तेरे रुखसार व कद में धूम डाला है गुलिस्ताँ में । उधर बुलबुल सिसकती है इधर कुमरी बिलकती है ।—कविता कौ॰, भा॰ ४, पृ॰ ४३ ।

३. भीड़ भाड़ और तौयारी । ठाट वाट । समारोह । भारी आयो- जन । जैसे,—बारात बड़ी धूम से निकली । उ॰—धाई धाम धाम धूम धौसा की धुकार धूरि ।—हम्मीर॰, पृ॰ २४ ।