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धोरे

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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धोरे पु † क्रि॰ वि॰ [सं॰ धर ( = किनारा)] पास । निकट । समीप । उ॰—उज्जवल देखि न घीजिए बग ज्यों माँडे ध्यान । धोरै बैठि चपेटसी थों लै बूड़े़ ज्ञान ।—कबीर (शब्द॰) । (ख) बिनवै चतुरानन कहि भोरैं । तुब प्रताप जा-यों नहि प्रभु जू कर स्तुति कर जोरैं । अपराधी मतिहीन नाथ हौं चूक परी निज धोरैं । हम कृत दोष छमौ करुणामय ज्यों भू परसत ओरे ।—सूर (शब्द॰) । (ग) झाँझरियाँ झनकैंगी खरी खनकैंगी चुरी तनिकौ तन तोरै । दास जू जागतीं पास अलीं परिहास करैगीं सबै उठि भोरे । सौंह तिहारी हौं भागि न जाहुँगी आइ हौं लाल तिहारे ही धोरै । केलि कौ रैनि परी है घरीक गई करि जाहु दई के निहोरे- दास (शब्द॰) । यौ॰—धोरे धोरे = आस पास ।

धोरे पु ^२ वि॰ [सं॰ धवल]

१. धवल ।

२. धुले हुए । उ॰—देखन के सब गोरे नव नव पानिप धोरे ।—नंद॰ ग्रं॰, पृ॰ २०५ ।