धौँ
प्रकाशितकोशों से अर्थ
[सम्पादित करें]शब्दसागर
[सम्पादित करें]धौँ पु † अव्य॰ [सं॰ अथवा हिं॰ दँव, दहुँ]
१. एक अव्यय जो ऐसे प्रश्नों के पहले लगाया जाता है जिनमें जिज्ञासा का भाव कम और संशय का भाव अधिक होता है । विचिकित्सा सूचक एक शब्द । न जाने । कौन जाने । मालूम नहीं । कहा नहीं जा सकता । उ॰—(क) कौन मोहनी धौं हुत तोही । जो तोहि बिथा सो उपजा मोहीं ।—जायसी (शब्द॰) । (ख) कला निधान सकल गुन आगर गुरु धौं कहा पढ़ाए ।—सूर (शब्द॰) । (ग) सीय स्वयंवर देखिय जाई । ईस काहि धौं देहिं बड़ाई ।—तुलसी (शब्द॰) । (घ) चिंतवत मोहि लगी चौंधी सी जानौं न कौन कहाँ ते धौं आए ।—तुलसी (शब्द॰) ।
२. प्रश्न के रूप में आनेवाले दो विकल्प या संदेहसूचक वाक्यों में से दूसरे या दोनों के पहले लगनेवाला शब्द । कि । या । अथवा । (इस अर्थ में प्रायः 'कि' या 'के' के साथ आता है) । उ॰—(क) सुनत सुदामा जात मनहि मन चीन्हैगे धौं नाहीं ।—सूर (शब्द॰) । (ख) की धौं वह पर्णकुटी कहुँ और, किधौं वह लक्ष्मण होय नहीं ।—केशव (शब्द॰) ।
३. एक शब्द जिसका प्रयोग जोर देने के लिये ऐसे प्रश्नों के पहले तो' या 'भला' के अर्थ में होता है जिनका उत्तर काकु से 'नहीं' होता है । यह प्रायः 'कहु' या 'कहो' के साथ आता है और 'कहो तो' का अर्थ देता है । उ॰—(क) तुलसी जेहि के रघुबीर से नाथ समर्थ सो सेवत रीझत थोरे । कहा भवभीर परी तेहि धौं बिचरैं धरनी तिनसों तिन तोरे ।—तुलसी (शब्द॰) । (ख) कंध न देइ मसखरी करई । कहु धौं कौन भाँति निस्तरई ।—जायसी (शब्द॰) । (ग) मोहिं परतीति यहि भाँति नहिं आवई । प्रीति कहु धौं सु नर वानरहि क्यों भई ।—केशव (शब्द॰) । (घ) बानी जगरानी की उदारता बखानी जाय ऐसी मति कहौ धौं उदार कौन की भई ।— केशव (शब्द॰) ।
४. किसी वाक्य के पूरे होने पर उसस े मिले हुए प्रश्नवाक्य का आरंभसूचक शब्द जो 'कि' अर्थ देता है । उ॰—(क) हमहु न जानौ धौं सो कहाँ ।—जायसी (शब्द॰) । (ख) कहो सो विपिन है धौं केति दूर ?— तुलसी (शब्द॰) ।
५. विधि, आदेश आदि वाक्यों के पहले आनेवाला एक शब्द जो केवल जोर देने के लिये उसी प्रकार आता है जिस प्रकार 'सोचिए तो', 'कर तो', 'समझ तो' आदि वाक्यों में 'तो' । उ॰—जिमि भानु बिनु बिनु दिन, प्रान बिनु तनु, चंद बिनु जिमि जामिनी । तिमि अवध तुलसीदास प्रभु बिनु समुझ धौं जिय भामिनी ।—तुलसी (शब्द॰) ।