ध्वनि

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हिन्दी

संज्ञा

  1. एक प्रकार का तरंग

प्रकाशितकोशों से अर्थ

शब्दसागर

ध्वनि संज्ञा स्त्री॰ [सं॰]

१. श्रवणेंद्रिय मे उत्पन्न संवेदन अथवा वह विषय जिसका ग्रहण श्रवणोद्रिय में हो । शब्द । नाद । आवाज । जैसे,मृदंग की ध्वनि, कंठ की ध्वनि । विशेष— भाषापरिच्छेद के अनुसार श्रवण के विषय मात्र को ध्वनि कहते है, चाहे वह वर्णात्मक हो, चाहे अवर्णात्मक । दे॰ 'शब्द' । क्रि॰ प्र॰— करना ।—होना । मुहा॰— ध्वनि उठना=शब्द उत्पन्न होना या फैलना ।

२. शब्द का स्फोट । शब्द का फूटना । आवाज की गूँज । नाद का तार । लय । जैसे, मृदंग की ध्वनि, गीत की ध्वनि । विशेष— शऱीरक भाष्य में ध्वनि उसी की कहा है जो दूर से ऐसा सुना जाय कि वर्ण बर्ण अलग और साफ न मालूम हो । महाभाष्यकार ने भी शब्द के स्फोट को हो ध्वनि कहा है । पाणिनि दर्शन में वर्णो का वाचकत्व न मानकर स्फोट ही के बल से अर्थ की प्रतिपत्ति मानी गई है । वर्णों द्बारा जो स्फुटित या प्रकट हो उसकी स्फोट कहते है, वह वर्णातिरिक्त है । जैसे ' कमल' कहने से अर्थ की जो प्रतीति होती है वह 'क' 'म' और 'ल' इन बर्णों के द्बारा नहीं, इनके उच्चारण से उप्तन्न स्फोट द्बारा होती है । वह स्फोट नित्य है ।

३. वह काव्य या रचना जिसमें शब्द और उसके साक्षात् अर्थ से व्यंग्य में विशेषता या चमत्कार हो । वह काव्य जिसमें वाच्यार्थ की अपेक्षा व्यंग्यार्थ अधिक विशेषतावाला हो । विशेष— जिस काव्य में शब्दों के नियत अर्थों के योग से सूचित होनेवाले अर्थ को अपेक्षा प्रसंग से निकलनेवाले अर्थ में विशेषता होती है । वह 'ध्वनि' कहलाता है । यह उत्तम माना गया है । वाच्यार्थ या अभिधेयार्थ से अतिरिक्त जो अर्थ सुचित होता है वह व्यंजना द्बारा । जैसे , छुटयो सबै कुच के तट चंदन, नैन निरंजन दूर लखाई । रोम उठे तव गा त लखात/?/रु साफ भई अधरान ललाई । पीर हितुन की जानति तु न, अरी ! वच बोलत झुठ सदाई । न्हायबै बापी गई इतसों, तिहि पापी के पास गई न तहाँई ।— (शब्द॰) । अपनी दुती से नायीका कहती है कि तेरी पान की ललाई, चंदन, अंजन आदि छुटे हुए है, तू बावली में नहाने गई, उधर ही से जरा उस पापी के यहाँ नहीं गई. यहाँ चंदन, अंजन आदि का छुटना नायक के साथ समागम प्रकट करता है । 'पापी शब्द भी 'तु समागम करने गई थी' यह बात व्यंग्य से प्रकट करता है । इस पद्य में ब्यंग्य ही प्रधान है— इसी में चमत्कार है ।

४. आशय । गूढ़ अर्थ । मतलब । जैसे,—उनकी बातों से यह ध्वनि निकलती थी कि बिना गए रुपया नहीं मिल सकताष