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नारू

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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नारू ^१ संज्ञा पुं॰ [देश॰]

१. जूँ । ढोल ।

२. एक रोग । विशेष—इस रोग में शरीर पर विशेषतः कटि के नीचे जंघा, टाँग आदि में फुंसिया सी हो जाती हैं और उन फुंसियों में से सूत सा निकलता है । यह सूत वास्तव में कीड़ा होता है जो बढ़ते बढ़ते कई हाथ की लंबाई का हो जाता है । ये कीड़े जब त्वचा के तंतुजाल में होते हैं तब नारू या नहरुवा होता है, जब रक्त की नालियों में होते हैं तब श्लीपद या फीलापाव रोग होता है । नारू का रोग प्रायः गरम देशों में ही होता है । ये कीड़े कई प्रकार के होते हैं । अधिकतर तो जीवधारियों के शरीर के भीतर रहते हैं पर कुछ तालों और समुद्र के जल में भी पाए जाते हैं । सिरके का कीड़ा इसी जाति का होता है । ये कीट यद्यपि पेट के केचुए से सूक्ष्म होते हैं तथापि इनकी शरीररचना केचुओं की अपेक्षा अधिक पूर्ण रहती है । इन्हें मुँह होता है, अलग अँतड़ी होती है, इनमें भेद होता है ।

नारू † ^२ संज्ञा पुं॰ [हिं॰ नाली, पुं॰ हिं॰ नारी] वह बोआई जो क्यारियों में होती है ।