नाव

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

नाव संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ नौ का बहुब॰ फा॰] लकड़ी लोहे आदि की बनी हुई जल के ऊपर तैरने या चलनेवाली सवारी । जलयान । नौका । किश्ती । विशेष—नावें बहुत प्राचीन काल से बनती आई हैं । भारतवर्ष, मिस्र, चीन इत्यादि देशों के निवासी व्यापार के लिये समुद्रयात्रा करते थे । ऋग्वेद में समुद्र मे चलनेवाली नावों का उल्लेख है । प्राचीन हिंदू सुमात्रा, जावा, चीन आदि की ओर बराबर अपने जहाज लेकर जाते थे । ईसा से तीन सौ वर्ष पहले कलिंग देश से लगा हुआ ताम्रलिप्त नगर भारत के प्रसिद्ध बंदरहगाहों में था । वहीं जहाज पर चढ़ सिंहल के राजा ने प्रसिद्ध बोधिद्रुम को लेकर स्वदेश की ओर प्रस्थान किया था । ईशा की पाँचवी शताब्दी में चीनी यात्री फाहियान बौद्ध ग्रंथों की नकल आदि लेकर ताम्रलिप्त ही से जहाज पर बैठ सिंहल गया था । पश्चिम में फिनीशिया के निवासियों ने बहुत पहले समुद्रयात्रा आरंभ की थी । टायर, कार्थेज आदि उनके स्थापित बड़े प्रसिद्ध बंदरगाह थे जहाँ ईसा से हजारों वर्ष पहले युरोप तथा उत्तरी अफ्रीका से व्यापार होता था । उनके पीछे यूनान और रोमवालों का जलयात्रा में नाम हुआ । पूर्वीय और पश्चिमी देशों के बीच का व्यापार बहुत दिनों तक अरबवालों के हाथ में भी रहा है । भारतवर्ष में यान दो प्रकार के कहे जाते थे—स्थलपान और जलपान । जलपान को निष्पद यान भी कहते ते । युक्तिकल्प- तरु नामक ग्रंथ में नौका बनाने की युक्ति का वर्णन है । सबसे पहले लकड़ी का विचार किया गया है । काष्ठ की भी चार जातियाँ स्थिर की गई हैं—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ओर शूद्र । जो लकड़ी हलकी मुलायम और गढ़ने योग्य हो उसे ब्राह्मण जो कड़ी, हलकी और न गढ़ने योग्य हो उसे क्षत्रिय, जो मुलायम और भारी हो उसे वैश्य तथा जो कड़ी और भारी हो से शूद्र कहा है । इनमें तीन द्विजाति काष्ठ हो नौका के लिये अच्छे कहे गए हैं । सामान्य छोटी नाव दस प्रकार की कही गई है—क्षुद्रा, मध्यमा, भीमा, चपला, पटला, अभया, दीर्घा, पत्रपुटा, गर्भरा और मँथरा । इसी प्रकार जहाज या बड़ी नाव भी दस प्रकार की बतलाई गई हैं—दीर्घिका, तरणि, लौला, गत्वरा, गामिनी, तरि, जंघला, प्लाविनी, धरणी और वेगिनी । जिन नावों पर समुद्रयात्रा गोती थी उन्हें प्राचीन भारतवासी साधारण 'यान' मात्र कहते थे । पर्या॰—नौ । तारिका । तरणि । तरी । तरंडी । तरंड । पादलिंद । तटलवा । होड । वार्वट । वहित्र । पोत । वहन । क्रि॰ प्र॰—खेना । चलाना । मुहा॰—सुखे में नाव नहीं चलती = बिना कुछ खर्च किए नाम नहीं होता । उदारता के बिना प्रसिद्धि नहीं होती । सूखे में नाव चलाना = असंभव कार्य करने की चेष्टा करना । नाव में घूल उड़ाना = (१) बिना सिर पैर की बात कहना । सरासर झूठ कहना । (२) झूठ अपराध लगाना । व्यर्थ कलंक लगाना ।