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निदर्शना

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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निदर्शना संज्ञा स्त्री॰ [सं॰] एक अर्थालंकार जिसमें एक बात किसी दूसरी बात को ठीक ठीक कर दिखाती हुई कही जाती है । यह ६ प्रकार की होती है । उ॰— (क) सरिसंगम हित चले ठेलते नाले पत्थर । दिखालाते पथरोध प्रेमियों का अति दुष्कर । (ख) जात चंद्रिका चंद्र सह विद्दुत घन सह जाय । पिय सहगमन जो तियन को जड़ हु देत दिखाय । (ग) कहाँ सुर्य को वंश अरू कहाँ मोरि मति छुद्र । मैं डूडे ,सों मोहवश चाहत तरयो समुद्र । (ध) जंगजीत जे चहत है ती सों वैर बढ़ाय । जीबे की इच्छा करत कालकूट ते खाय । (च) उदय होन दिननाथ इत अथवत उत निशिराज । द्वय घंटायुत द्बिरद की छवि धारत गिरी आज । (छ) लघु उन्नत पद प्राप्त ह्वै तुरताहि लहत निपात । गिरि तें काँकर बात बस गिरत कहत यह बात । विशेष— इस अंलंकार के भिन्न भिन्न लक्षण आचार्यो ने लिखे हैं । जहाँ होता हुआ वस्तुसंबंध और न होता हुआ वस्तुसंबध दोनों बिबानुबिंब भाव से दिखाए जाते हैं वहाँ निदर्शना होती है ।