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निपजना

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शब्दसागर

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निपजना पु † क्रि॰ अ॰ [सं॰ निष्पद्य, (+ ते) प्रा॰ निपज्जइ]

१. उपजना । उत्पन्न होना । उगना । जमना । उ॰—(क) राम नाम कर सुमिरन हंसि कर भावै खीज । उलटा सुलटा नीपजै ज्यों खेतम में बीज ।—कबीर (शब्द॰) । (ख) अमिरित बरसै हीरा निपजै घटा परै टकसार । तहाँ कबीरा पारखी अनुभव उतरे पार ।—कबीर (शब्द॰) ।

२. बढ़ना । पुष्ट होना । पकना । उ॰—भली बुद्धि तेरे जिय उपजी । ज्यों ज्यों दिनी भई त्यों निपजी ।—सूर (शब्द॰) ।

३. बनना । तैयार होना । उ॰—सिख खाँड़ा गुरु मसकला चढ़ै शब्द खरसान । शब्द सहै सम्मुख रहै निपजै शिष्य सुजान ।— कबीर (शब्द॰) ।