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निरंग

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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निरंग ^१ वि॰ [सं॰ निरङ्ग] अंगरहित ।

२. केवल । खाली । जिसमें कुछ न हो । जैसे,—यह दूघ निरंग पानी है ।

३. रूपक अलंकार का एक भेद । विशेष—रूपक दो प्रकार का होता है—एक अभेद दूसरा ताद्रूत्य । अभेद रूपक भी तीन प्रकार का होता है—सम, अधिक और न्यून । इनमें से 'सम अभेंद रूपक' के तीन भेद हैं—संग या सावयब, निरंग या निरवयव और परंपरित । जहाँ उपमेय में उपमान का इस प्रकार आरोप होता है कि उपमान के और सब अंग नहीं आते वहाँ निरवयव या निरंग रूपक होता है—जैसे, 'रैन न नींद न चैन हिए छिनहूँ घर में कछु और न भावै । सीचन को अब प्रेमलता यहि के हिय काम प्रवेश लखावै' । यहाँ प्रेम में केवल लता का आरोप है उसके और अंगों या सामग्रियों का कथन नहीं है । निरंग या निरवयव रूपक भी दो प्रकार का होता है—शुद्ध और मालाकार । ऊपर जो उदाहरण है वह शुद्ध निरवयव का है क्योंकि उसमें एक उपमेय में एक ही उपमान का (प्रेम में लता का) । आरोप हुआ है । मालाकार निरवयव वह है जिसमें एक उपमेय में बहुत से उपमानों का आरोप हो—जैसे, 'भँवर सँदेह की अछेह आपरत, यह गेह त्यों अनम्रता की देह दुति हारि है । दोष की निधान, कोटि कपट प्रधान जामें, मान न विश्वास द्रुम ज्ञान की कुठारी है । कहै तोष हरि स्वर्गद्बार की विघन धार, नरक अपार की विचार अधिकारी है । भारी भयकारी यह पाप की पिटारी नारी क्यों करि विचारि याहि भाखैं मुख प्यारी हैं । यहाँ एक स्त्री उपमेय में संदेह का भँवर; अविनय का घर, इत्यादि बहुत से आरोप किए गए हैं ।

निरंग ^२ वि॰ [हिं॰ उप॰ नि ( = नहीं) + रंग]

१. बेरंग । बद- रंग । विवर्ण ।

२. फीका । उदास । बेरौनक । उ॰—सो धनि पान चून भई चोली । रंग रंगील, निरंग भई डोली ।— जायसी (शब्द॰) ।