पत्थर

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हिन्दी[सम्पादन]

संज्ञा[सम्पादन]

  1. शिला

अनुवाद[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

पत्थर संज्ञा पुं॰ [सं॰ प्रस्तर, प्रा॰ पत्थर] [वि॰ पथरीला, क्रि॰ पथराना]

१. पृथ्वी के कड़े स्तर का पिंड या खंड । भूद्रव्य का कड़ा पिंड या खंड । विशेष— भूगर्भ शास्त्र के अनुसार पृथ्वी की बनावट में अनेक स्तर या तहें हैं । इनमें से अधिक कड़ी कलेवरवाली तहों का नाम पत्थर है । पत्थरों के मुख्य दो भेद हैं—आग्नेय और जलज । आग्नेय पत्थरों की उत्पत्ति, भूगर्भस्थ ताप के उद्भेद से होती है । पृथ्वी के गर्भ से जो तरल पदार्थ अत्यंत उत्तप्त अवस्था में इस उद्भेद द्वारा ऊपर आता है वह कालांतर में सरदी से जमकर चट्टानों का रूप धारण करता है । इस रीति पर पत्थर बनने की क्रिया भूगर्भ के भीतर होती है । उपर्युक्त तरल पदार्थ भूगर्भ स्थित चट्टानों से टकराकर अथवा अन्य कारणों से भी अपनी गरमी खो देता और पत्थर के रूप में ठोस हो जाता है । जलज पत्थर जल के प्रवाह से बनते हैं । मार्ग में पड़नेवाले पत्थर आदि पदार्थों को चूर्ण करके जल- धारा कीचड़ के रूप में उन्हें अपने प्रवाह के साथ बहा ले जाती है । जिस कीचड़ के उपादान में कड़े परमाणु अधिक होते हैं वह जमने पर पत्थर का रूप धारण करता है । जलज पत्थरों की बनावट प्रायः तह पर तह होती है पर आग्नेय पत्थरों की ऐसी नहीं होती । उपादन के भेद से भी पत्थरों के कई भेद होते हैं, जैसे आग्नेय में संगखरा, शालिग्रामी या संगमूसा आदि और जलज में बलुआ, दुधिया, स्लेट का पत्थर, संगमरमर, स्फटिक आदि । आग्नेय और जलज के अतिरिक्त अस्थिज पत्थर भी होता है । धोंघे आदि सामुद्रिक जीवों की अस्थियाँ विश्लिष्ट होने के पश्चात् दबाव के कारण पुनः घनीभूत होकर ऐसे पत्थर की रचना करती हैं । खड़िया मिट्टी इसी प्रकार का पत्थर है । जिस प्रकार साधारण कीचड़ कठिन होकर पत्थर के रूप में परिवर्तित हो जाता है उसी प्रकार साधारण पत्थर भी दबाव की अधिकता और आसपास की वस्तुओं तथा जलवायु के विशेष प्रभाव के कारण रासायनिक अवस्थांतर प्राप्तकर स्फटिक अथवा पारदर्शी पत्थर या मणि का रूप धारण करता है । पत्थर मानव जाति के लिये अत्यंत उपयोगी पदार्थ है । आज जो काम विविध धातुओं से लिए जाते हैं आदिम अवस्था में वे सभी केवल पत्थर से लिए जाते थे । जबतक मनुष्यों ने धातुओं की प्राप्ति का उपाय और उनका उपयोग नहीं जाना था तबतक उनके हथियार, औजार, बरतन झाँड़े सब पत्थर के ही होते थे । आजकल पत्थर का सबसे अधिक उरयोग मकान बनाने के काम में किया जाता है । इससे बरतन, मूर्तियाँ, टेबुल, कुर्सी, आदि भी बनती है । संगमरमर आदि मुलायम और चमकीले पत्थरों से अनेक प्रकार की सजावट की वस्तुएँ और आभूषण आदि भी बनाए जाते हैं । भारत- वासी बहुत प्राचीन काल से ही पत्थर पर अनेक प्रकार की कारीगरी करना सीख गए थे । बढ़िया मूर्तियाँ, बारीक जालियाँ, अनेक प्रकार के फूल पत्ते आदि बनाने में वे अत्यंत कुशल थे । बौद्धों के समय में मूर्तितक्षण और मुगलों के समय में जाली, बेलबूटे आदि बनाने की कलाएँ विशेष उन्नत थीं । यद्यपि मुगल काल के बाद से भारत के इस शिल्प का बराबर ह्रास हो रहा है, फिर भी अभी जयपुर में संगमरमर के बरतन और आगरे में अलंकार आदि बड़े साफ और सुंदर बनाए जाते हैं । भारत के पहाड़ों में सब प्रकार के पत्थर मिलते हैं । विंध्य पर्वत इमारती पत्थरों के लिये और अरावली पर्वत संगमरमर के लिये प्रसिद्ध हैं । विशेष दे॰ 'संगमरमर' । बोलचाल में पत्थर शब्द का प्रयोग अत्यंत कड़ी अथवा भारी, गतिशून्य अथवा अनुभूतिशून्य वस्तु, दयाकरुणाहीन, अत्यं त जड़बुद्धि अथवा परम कृपण व्यक्ति आदि के संबंध के होता है । पर्या॰—पाषाण । ग्रावन् । उपल । अश्मन् । दृषत् । पादारुक काचक । शिला । यौ॰—पत्थरकला । पत्थरचटा । पत्थरफोंड़ा । मुहा॰—पत्थर का कलेजा, दिल या हृदय = अत्यंत कठोर हृदय । वह हृदय जिसमें, दया, करुणा, आदि कोमल वृत्तियों का स्थान न हो । किसी के दुःख पर न पसीजनेवाला दिल या हृदय । पत्थर का छापा = (१) छपाई का वह प्रकार जिसमें ढले हुए अक्षरों से काम नहीं लिया जाता, बल्कि छापे जानेवाले लेख की एक पत्थर पर प्रतिलिपि उतारी जाती है और उसी पत्थर के ऊपर कागज रखकर छापते हैं । लीथोग्राफ । लीथो की छपाई । विशेष दे॰ 'प्रेस' (२) पत्थर के छापे में छपा हुआ विषय या लेख । पत्थर के छापे का काम । पत्थर के छापे की छापाई । जैसे, —(किसी पुस्तक की छपाई के विषय में) यह ते पत्थर का छापा है । पत्थर की छाती = कभी न टूटनेवाली हिम्मत अथवा कभी न हारनेवाला दिल । असफलता या कष्ट से विचलित न होनेवाला हृदय । बलवान् और दृढ़ हृदय । मतबूत दिल । पक्की तबीयत । जैसे —सच- मुच उस मनुष्य की पत्थर की छाती है, इतना भारी दुःख सह लिया, आह तक नहीं की । पत्थर की लकीर = सदा सर्वदा बनी रहनेवाली (वस्तु) । सर्वकालिक । अमिट । पक्की । स्थायी । जैसे,—ओछों की मित्रता पानी की लकीर और सज्जनों की मित्रता पत्थर की लकीर है । (कहावत) । पत्थर को जोंक लगाना = अनहोनी या असंभव बात करना । वह कार्य करना जो औरों के लिये असाध्य हो । जैसे, अत्यंत कृपण से दान दिलाना, अत्यंत निर्दय के हृदय में दया उत्पन्न कर देना, वज्र मूर्ख को समझा देना, आदि । पत्थर चटाना = पत्थर पर घिसकर धार तेज करना । छुरी, कटार, आदि की धार पत्थर पर रगड़कर तेज करना । पत्थर तले हाथ आना = ऐसे संकट में फँस जाना जिससे छूटने का उपाय न दिखाई पड़ता हो । बुरी तरह फँस जाना । भारी संकट में फँस जाना । पत्थर तले हाथ दबना = दे॰ 'पत्थर तले हाथ आना' । पत्थर तले से हाथ निकालना = संकट या मुसीबत से छूटना । पत्थर निचोड़ना = (१) जो वस्तु जिससे मिलना असंभव हो वह वस्तु उससे प्राप्त करना । किसी से उसके स्वभाव के अत्यंत विरुद्ध कार्य कराना । (२) अनहोनी बात या असंभव कार्य करना । (विशेष—इस मुहावरे का प्रयोग विशेषतः कृपण के मन में दान की इच्छा या निर्दय के हृदय में दया का भाव उत्पन्न करने के अर्थ में होता है ।) पत्थर पर दूब जमाना = अनहोनी बात या असंभव काम होना । ऐसी बात होना जिसके होने की आशा सर्वथा छोड़ दी गई हो । जैसे, बंध्या समझी जानेवाली के पुत्र होना आदि । पत्थर पसीजना = अनहोनी बात होना । अत्यंत कठोर चित्त में नरमी, कृपण के मन में दानेच्छा, अत्याचारी के मन में दया उत्पन्न होना, आदि । जैसे,—तीन वर्ष की तपस्या से यह पत्थर पसीजा है । पत्थर पिघलाना = दे॰ 'पत्थर पसीजना' । पत्थर मारे भी न मरना = मरने का कारण या सामान होने पर भी न मरना । बेहयाई से जीना । निहायत सख्त जान होना । पत्थर सा खींच या फेंक मारना = बहुत बड़ी बात कहना या उत्तर देना । ऐसी बात कहना जो सुननेवाले को असह्य हो । लट्ठमार बात कहना या उत्तर देना । पत्थर से सिर फोड़ना या मारना = असंभव बात के लिये प्रयत्न करना । व्यर्थ सिर खपाना । अत्यंत मूर्ख को समझाने में श्रम करना ।

२. सड़क के किनारे गड़ा हुआ वह पत्थर जिसपर मील के संख्यासूचक अंक खुदे होते हैं । सड़क की नाप सूचित करनेवाला पत्थर । मील का पत्थर । जैसे,—तीन घंटे से हमलोग चल रहे हैं, लेकिन सिर्फ चार पत्थर आए हैं ।

३. ओला । बिनौली । इंद्रोपल । क्रि॰ प्र॰—गिरना ।—पड़ना । मुहा॰—पत्थर पड़ना = (१) चौपट हो जाना । नष्टभ्रष्ट हो जाना । जैसे,—तुम्हारी बुद्घि पर पत्थर पड़ गया है । (२) कुछ न पाना । मनोरथ भंग होने का सामान मिलना । सियापा पड़ जाना या पड़ा पाना । जैसे,—भाग्य की बात है कि जहाँ जहाँ जाता हूँ वहीं पत्थर पड़ जाते हैं । पत्थर पड़े = चौपट हो जाय । मारा जाय । ईश्वर का कोप पड़े । (अभिशाप और अक्सर तिरस्कार या निंदा के अर्थ में भी बोलते हैं । जैसे,—पत्थर पड़े ऐसी ओछी समझ पर ।) पत्थर पानी = महाभूतों की प्रतिकूलता अथवा प्रकोप का काल । आँधि पानी आदि का काल । तूफानी समय । जैसे,—भला इस पत्थर पानी में कौन जान देने जायगा ?

४. रत्न । जवाहिर । हीरा, लाल, पन्ना आदि ।

५. पत्थर का का सा स्वभाव रखनेवाली वस्तु । पत्थर की तरह कठोर, भारी अथवा हटने, गलने आदि के अयोग्य वस्तु । जैसे, अत्या- चारी का हृदय, जड़बुद्धि का मस्तिष्क, बड़ा ऋण, दुंर्जर भोज्य, आदि । क्रि॰ प्र॰—बनाना ।—बन जाना ।—होना ।

३. कुछ नहीं । बिलकुल नहीं । खाक (तुच्छता या तिरस्कार के साथ अभाव सूचित करता है) । जैसे,—(क) तुम इस किताब को क्या पत्थर समझोगे । (ख) वहाँ क्या पत्थर रखा है ?

पत्थर कला संज्ञा पुं॰ [हिं॰ + पत्थर कल] पुरानी चाल की बंदूक जिसमें बारूद सुलगाने के लिये चकमक पत्थर लगा रहता था । तोड़ेदार या पलीतेदार बंदूक । चाँपदार बंदूक । विशेष— दे॰ 'बंदूक' ।