परन
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प्रकाशितकोशों से अर्थ
[सम्पादित करें]शब्दसागर
[सम्पादित करें]परन ^१ संज्ञा पुं॰ [?] मृदंग आदि बाजों को बजाते समय मुख्य बोलों के बीच बीच से बजाए जानेवाले बोलों के खंड । उ॰—आनंदघन रस रंग घमंड सों ललिता । मृदंग बजावति, परन भरनि सी परति आवै गौहन ।—घनानंद, पृ॰ ३४५ ।
परन ^२ संज्ञा पुं॰ [सं॰ प्रतिज्ञा, प्रा॰ पडिण्णा, अथवा सं॰ प्रण या पण ( = वाजी, शर्त)] प्रतिज्ञा । टेक । प्रण । वायदा । द्दढ़ संकल्प । उ॰—जब रहली जननी के ओदर, परन, सम्हारल हो ।—घरम॰, पृ॰ ३५ । क्रि॰ प्र॰—करना ।—बाँधना ।—होना ।
परन ^३ संज्ञा स्त्री॰ [हिं॰ पड़ना, पड़न] पड़ी हुई । बान । आदत । उ॰—राखों हटकि उतै को धावै उनकी वैसिय परन परी री ।—सूर (शब्द॰) ।
परन पु ^४ संज्ञा पुं॰ [सं॰ पर्ण] दे॰ 'पर्ण' । उ॰—(क) पुनि परिहरे सुखानेउ परना ।—मानस, १ ।७४ । (ख) सो उपजे हैं आय ये परन कुटी के द्बार ।—शकुंतला, पृ॰ ७९ । यौ॰—परनकुटी । परनगृह = दे॰ 'परनकुटी' ।