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परागना

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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परागना पु क्रि॰ स॰ [सं॰ उपराग] अनुरक्त होना । उ॰— ऊधो तुम हो अति बड़ भागी । अपरस रहत सनेह तगा ते नाहिन मन अनुरागी । पुरइन पात रहत जल भीतर ता रस देह न दागी । ज्यों जल माँह तेल की गागरि बूँद न ताको लागी । प्रीति नदी महँ पाँव न बोरयो दृष्टि न रूप परागी । सूरदास अबला हम भोरी गुर चोंटी ज्यों पागी ।—सूर (शब्द॰) ।