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पराना

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शब्दसागर

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पराना पु † क्रि॰ अ॰ [सं॰ पलायन] भागना । उ॰—(क) आज जो तरवर चलभल नाहीं । आवहु यहि बन छाँड़ि पराहीं ।—जायसी (शब्द॰) । (ख) भाई रे गैया एक विरंचि दियो है भार अमर भो भाई । नौ नारी को पानी पियत है तृषा तऊ न बुझाई । कोठा बहतरि औ लौ लावे बज्र केवार लगाई । खूँटा गाड़ि डोर दृढ़ बाँधो तउ वह तोरि पराई ।—कबीर (शब्द॰) । (ग) देखि विकट भट बड़ि कटकाई । जच्छ जीव लइ गए पराई ।—मानस, १ ।१७९ । (घ) जासु देस नृप लीन्ह छोड़ाई । समर सेन तजि गयउ पराई ।—तुलसी (शब्द॰) ।