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परिबृंहण

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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परिबृंहण संज्ञा पुं॰ [सं॰] [वि॰ परिबृंहित ]

१. समृद्धि उन्नति । बढ़ति ।

२. बढ़ना ।

३. वह ग्रंथ अथवा शास्त्र जो किसी अन्य ग्रंथ या शास्त्र के विषय की पूर्ति या पुष्टि करता हो । किसी ग्रंथ के अंगस्वरुप अन्य ग्रंथ । जैसे— ब्राह्मण आदि ग्रंथ वेद के परिबृंहण है ।