परिवृत्ति
प्रकाशितकोशों से अर्थ
[सम्पादित करें]शब्दसागर
[सम्पादित करें]परिवृत्ति संज्ञा स्त्री॰ [सं॰] ढकने, घेरने या छिपानेवाली वस्तु । वेष्टन ।
परिवृत्ति संज्ञा स्त्री॰ [सं॰]
१. घुमाव । चक्कर । गरदिश ।
२. घेरा । वेष्टन ।
३. अदला बदला । विनिमय । तबादला ।
४. समाप्ति । अंत ।
५. एक शब्द या पद को दूसरे ऐसे शब्द या पद से बदलना जिससे अर्थ वही बना रहे । ऐसा शब्द- परिवर्तन जिसमें अर्थ में कोई अंतर न आने पावे । जैसे,— 'कमललोचन' के 'कमल' अथवा 'लोचन' को 'पझ' या 'नयन' से बदलना (व्याकरण) ।
परिवृत्ति संज्ञा पुं॰ एक अर्थालंकार जिसमें एक वस्तु को देकर दूसरी वस्तु लेने अर्थात् लेनदेन या अदल बदल का कथन होता है । विशेष—इस अलंकार के दो प्रधान भेद हैं—एक सम परवृत्ति, दूसरा विषम परिवृत्ति । पहले में समान गुण या मूल की और दूसरे में असमान गुण या मूल्य की वस्तुओं के अदल- बदल का वर्णन होता है । इन दोनों के दो दो अवतार भेद होते है । सम के अंतर्गत एक उत्तम वस्तु का उत्तम से विनि- मय; दूसरा न्युन वस्तु का न्युन से विनिमय है । इसी प्रकार विषम के अंतर्गत उत्तम वस्तु का न्युन से और न्युन का उत्तम से विनिमय होता है । जैसे,—(क) मन मानिक दीन्हों तुम्हें लीन्हीं बिरह बलाय । (वि॰ परि॰—उत्तम का न्यून से विनिमय) (ख) तीन मूठी भरि आज देकर आनाज आपु लीन्हों जदुपति जू सों राज तीनों लोक को (वि॰ परि॰- न्यून का उत्तम से विनिमय) । हिंदी कविता में प्रायः विषम परिवृत्ति के ही उदाहरण मिलते हैं । कई आचार्यों ने इसी कारण न्यून या थोड़ा देकर उत्तम या अधिक लेने के कथन को ही इस अलकार का लक्ष्ण माना है, सम का सम के साथ विनिमय के कथन को नहीं । परंतु अन्य कई आचार्यों तथा विशेषतः साहित्यदर्पण आदि साहित्य ग्रंथों ने देनलेन या अदल बदल के कथन मात्र को इस अलंकार का लक्षण प्रतिपादित किया है ।