परिसर्प
प्रकाशितकोशों से अर्थ
[सम्पादित करें]शब्दसागर
[सम्पादित करें]परिसर्प संज्ञा पुं॰ [सं॰]
१. किसी के चारों ओर घूमना । परिक्रिया । परिक्रमण ।
२. टहलना । चलना । घूमना । फिरना ।
३. किसी की खोज में जाना । किसी के पोछे उसे ढूँढ़ते हुए जाना ।
४. साहित्यदर्पण के अनुसार नाटक में किसी का किसी की खोज में भटकना जब कि खोजी जानेवाली वस्तु के जाने की दिशा या अवस्थिति का स्थान अज्ञात हो, केवल मार्ग के चिह्नों आदि के सहारे उसका अनुमान किया जाय; जैसे शकुंतला नाटक के तीसरे अंक में दुष्यंत का शकुंतला । की खोज करना और निम्नलिखित दोहों में वर्णित चिह्नों से उसके जाने के रास्ते और ठहरने के स्थान का निश्चय करना । उ॰—(क) जिन डारन ने मम प्रिया लुने फूल अरु पात । सूख्यो दूध न छत भरयो तिनकौं अजौं लखात । (ख) लिए कमल रज गंधि अस कर मालिनी तरंग । आय पवन लागत भली मदन देत मम अंग । (ग) दीखत पंडू रेत में नए खोज या द्बार । आगे उठि, पाछे धसकि रहे नितंबन भार ।—शकुंतला नाटक
५. एक प्रकार का साँप ।
६. घेरना । आवेष्टित करना (को॰)
७. सुश्रुत के अनुसार ११ क्षुद्र कुष्टों में से एक । इसमें छोटी छोटी फुंसियाँ निकलती हैं जो फूटकर फैलती जाती है । फुंसियों से पंछा या पीव भी निकलता है ।