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परेखा

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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परेखा पु संज्ञा पुं॰ [सं॰ परीक्षा]

१. परीक्षा । जाँच ।

२. विश्वास । प्रतीति । उ॰— (क) समुझि सो प्रीति कि रिति श्याम की सोइ बावर जो परेखो उर आनै ।—तुलसी (शब्द॰) । (ख) दूत हाथ उन लिखि जो पठयो ज्ञान कह्यो गीता को । तिनको कहा परेखो कीजै कुबिजा को मीता को ।— सूर (शब्द॰) ।

३. पछतावा । अफसोस । खेद । विषाद । उ॰— (क) दृग रिझवार न हिय रहै, यहै परेखो एक । वारन को मन एक इत उत है अदा अनेक ।—रसनिधि (शब्द॰) । (ख) इतनो परेखो समरथ सब भाँति आजु कपिराज साँची कही को तिलोक तोसी है ।— तुलसी (शब्द॰) । (ग) अरे परेखो को करै तुही बिलोकि विचार । केहि नर केहि सर राखियो खरे बढ़े पर पार ।—बिहारी (शब्द॰) ।