पहुँचना

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हिन्दी[सम्पादन]

क्रिया[सम्पादन]

अनुवाद[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

पहुँचना क्रि॰ अ॰ [सं॰ प्रभूत ( = ऊपर गया हुआ) प्रा॰ पहुच्च, पहूच + हिं॰ ना (प्रत्य॰)]

१. एक स्थान से चलकर, दूसरे स्थान में प्रस्तुत या प्राप्त होना । गति द्वारा किसी स्थान में प्राप्त या उपस्थित होना । जैसे, लड़कों का पाठशाला में पहुँचना, घडे़ के अंदर हाथ पहुँचना । उ॰— (क) सारँग ने सारँग गह्यो सारँग पहुँच्यो आय । — (शब्द॰) । (ख) घर घरनि परनि रा पंग की पहुँचै इहै बडष्पनो । — पृ॰ रा॰, ६१ । १५७५ । संयो॰ क्रि॰—जाना । मुहा॰— पहुँचनेवाला = बडे़ बडे़ लोगों के यहाँ जानेवाला । जहाँ साधारण लोग नहीं जा सकते उन स्थानों में जानेवाला । जिसकी गति या प्रवेश बडे़ बडे़ स्थानों या लोगों में हो । पहुँचा हुआ = ईश्वर के निकट पहुँचा हुआ । ईश्वर की समी- पता प्राप्त । सिद्ध । जैसे,— वह पहुँचा हुआ महात्मा है ।

२. किसी स्थान लक लगातार फैलना । कहीं तक विस्तृत होना । जैसे,— (क) यहाँ समुद्र पहाड़ के निकट तक पहुँचा है । (ख) मेरा हाथ वहाँ तक नहीं पहुँचता । ३ एक स्थिति या अवस्था से दूसरी स्थिति या अवस्था को प्राप्त होना । एक हालत से दूसरी हालत में जाना । जैसे,— वे एक निर्धन किसान के लडके होकर भी प्रधान मंत्री के पद पर पहुँच गए । संयो॰ क्रि॰— जाना ।

४. घुसना । पैठना । प्रविष्ट होना । समाना । जैसे,— कपड़ो में सील पहुँचना, दिमाग में ठंढक पहुँचना ।

५. किसी के अभिप्राय या आशय को जान लेना । किसी बात का मुख्य अर्थ समझ में आ जाना । गूढ अर्थ अथवा अतिरिक्त आशय को ज्ञात कर लेना । ताड़ना । मर्म जान लेना । समझना । जैसे,— अधिक कहने की आवश्यकता नहीं, मैं आपके मतलब तक पहुँच गया ।