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पित्ता

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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पित्ता संज्ञा पुं॰ [सं॰ पित्त]

१. जिगर में वह थैली जिसमें पित्त रहता है । पित्ताशय । विशेष विवरण के लिये दे॰ 'पित्ताशय' । मुहा॰—पित्ता उबलना = दे॰ 'पित्ता खौलना' । पित्ता खौलना = बड़ा क्रोध आना । मिजाज भड़क उठना । जैसे—तुम्हारी बातें सुनकर तो उसका पित्ता खौल गया । विशेष—पित्त का नाम अग्नि तथा तेज मी है, इन्हीं कारणों से इन मुहावरों की उत्पात्ति हुई है । पित्ता उबलना, पित्ता खौलना, आदि पित्त उबलना या पित्त खौलना का लक्षणा- त्मक रूप है । पित्ता निकालना † ‡ = काम कराके अथवा और किसी प्रकार से किसी को अत्यंत पीड़ित करना । बहुत अधिक परिश्रम का काम कराना । पित्ता पानी करना = बहुत परिश्रम करना । जान लड़ाकर काम करना । अति कठोर प्रयास करना । जैसे,—इस काम में बड़ा पित्ता पानी करना पड़ेगा । पित्ता मरना = कुद्ध या उत्तेजित होने की आदत छूट जाना । गुस्सा न रह जाना । जैसे,—अब उसका पित्ता बिलकुल मर गया । पित्ता मारना = (१) क्रोध दबाना । क्रोध होने पर चित्त शांत रखना । सहना । उत्तेजना को दबा रखना । जब्त करना । जैसे,—मैं पित्ता मारकर रह गया नहीं तो अनर्थ हो जाता । (२) बिना उदविग्न हुए या ऊबे कोई कठिन काम करते रहना । कोई अरुचिकर या कठिन काम करने में न ऊबना । जैसे,—जो बड़ा पित्ता मारे वह इस काम को कर सकता है । पित्तमार काम = वह काम जो रुचिकर न हो । अरुचिकर और कठिन काम । कर्ता को उबा देनेवाला काम । मन मारकर किया जानेवाला काम ।

२. हिम्मत । साहस । हौसला । जैस,---उसका कितना पित्ता है जो दो दिन भी तुम्हारे मुकाबले ठहर सके ।