पीण्ड
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प्रकाशितकोशों से अर्थ
[सम्पादित करें]शब्दसागर
[सम्पादित करें]पींड † संज्ञा पुं॰ [सं॰ पिण्ड]
१. शरीर । देह । पिंड । उ॰— बिन जिव पींड छार करि कूरा । छार मिलावइ सो हित पूरा ।— जायसी (शब्द॰) ।
२. वृक्ष का धड़ । वृक्ष देह । तना । पेड़ी । उ॰— कटहर डार पींड सो पाके । बड़हर सोउ अनूप अति ताके ।— जायसी ग्रं॰ (गुप्त), पृ॰ १३८ ।
३. किसी गीली वस्तु का गोला । पिंड । पिंडी ।
४. कोल्हू के चारों ओर गीली मिट्टी का बनाया हुआ घेरा जिसमें से ईख की अंगारियाँ या छोटे टुकडे़ छटककर बाहुर नहीं निकलने पाते ।
५. चरखे का मध्य भाग । बेलन ।
६. शिरोभूषण । दे॰ 'पीड़' । उ॰— (क) शिखी की भाँति शिर पींड डोलत सुभग चाप ते अधिक नवमाल शोभा ।— सूर (शब्द॰) । (ख) पींड श्रीखंड शिर भेष नटवर कसे अंग इक छटा मैं ही भुलाई ।— सूर (शब्द॰) ।
७. पिंडखजूर नामक फल । उ॰— खरिक दाख अरु गिरी चिरारी । पींड बदाम लेत बनवारी । — सूर (शब्द॰) ।