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पुंसवन

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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पुंसवन ^१ संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. दुग्ध । दुध ।

२. द्धिजातियों के सोलह संस्कारों में से दुसरा संस्कार जो गर्भाधान से तीसरे महीने में किया जाता है । गर्भिणी पुत्र प्रसव करे इस अभिप्राय से यह किया जाता है । विशेष—गर्भ हिलने डोलने के पहले हील यह संस्कार होना चाहिए । अच्छे दिन और मुहुर्त में अग्निस्थापना करके स्त्री और पुरुष कुशासन पर बैठते हैं । पति उठकर स्त्री का दाहिना कधा स्पर्श करता है, फिर दाहिने हाथ से स्त्री के नाभि को स्पर्श करता है फिर दाहिने हाथ से स्त्री के नाभि को स्पर्श करता हुआ कुछ मंत्र पढ़ता है । यहाँ तक तो प्रथम पुंसवन हुआ । फिर दुसरे दिन या उसी दिन किसी बटवृक्ष की पुर्वोत्तर शाखा की टहनी के दो फलोंवाले सिरे (शुंगा= फुनगी) को जौ या उरद देकर सात बार मंत्र पढ़कर क्रय करते हैं औऱ मंत्र पढ़ते हुए नोचकर लाते हैं । बट की फुनगी को साफ सिल पर ओस के पानी से पीसते हैं । फिर इस बरगद के रस को पश्चिम ओर मुँह करके बैठी स्त्री के पीछे होकर पति उसकी नाक के दाहिने नयुने में डाल देता हैं ।

३. गर्भ (को॰) ।

४. बैष्णवों का एक व्रत । भागवत में यह व्रत स्त्रियों के लिये कर्तव्य कहा है ।

पुंसवन ^२ वि॰ प्रत्रोत्पादक ।