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पुनर्नवा

विक्षनरी से

प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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पुनर्नवा संज्ञा स्त्री॰ [सं॰] एक छोटा पौधा जिसकी पत्तियाँ चौलाई की पत्तियों की सी गोल गोल होती हैं । विशेष—फूलों के रंग के भेद से यह पौधा तीन प्रकार का होता है—श्वेत, रक्त और नील । श्वेत पुनर्नवा को विषखपरा और रक्त पुनर्नवा को साँठ या गदहपूरना कहते हैं । श्वेत पुनर्नवा या विषखपरे का पौधा जमीन पर फैला होता है, ऊपर की ओर बहुत कम जाता है । फूल सफेद होते हैं । साँठ या गदह- पूरना ऊसर और कँकरीली जमीन पर अधिक होती है । फूल लाला होते हैं, डंठल लाल होते हैं और पत्तियाँ भी किनारे पर कुछ ललाई लिए होती हैं । पुनर्नवा की जड़ मूसला होती है और नीचे दूर तक गई होती है । औषध में इसी जड़ का व्यवहार अधिकतर होता है पुनर्नवा कड़वी, गरम, चरपरी, कसैली, रुचिकारक, अग्निदीपक, रूखी, खारी, दस्तावर, हृदय और नेत्र को हितकारी, तथा सूजन, कफ, वात, खाँसी, बवासीर, सूल, पांडू रोग इत्यादि को दूर करनेवाली मानी जाती है । नेत्ररोगों में तो यह बहुत उपकारी मानी जाती है । इसकी जड़ को पीते भी हैं और घिसकर घी आदि के साथ अंजन की तरह लगाते भी हैं । ऐसा प्रसिद्ध है कि इसके सेवन से आँखें नई हो जाती हैं । पर्या॰—(क) श्वेत पुनर्नवा । श्वेतमूला । कठिल्ल । चिराटिका । बृश्चीरा । सितवर्षाभू । वर्षागी । वर्षाही । विसाख । शशि- वाटिका । पृथ्वा । घनपत्र । शोथघ्नी । दीर्घपत्रिका । (ख) रक्त पुनर्नवा । रक्तपत्रिका । रक्तकांड । वर्षकेतु । वर्षाभू । रक्तपष्पा । लोहिता । क्रूरा । मडलपत्रिका । चिकस्वरा । विषघ्नी । सारिणी । शोणपत्र । भौमा । पुनर्भव । नव । नव्य । (ग) नीलपुनर्नवा । नीला । श्यामा । नीलवर्षाभू । नीलिनी ।