पूँछ

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

पूँछ संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ पुच्छ]

१. मनुष्य से भिन्न प्राणियों के शरीर का वह गावदुमा भाग जो गुदा मार्ग के ऊपर रीढ़ की हड्ड ी की संधि में या उससे निकलकर नीचे की और कुछ दूर तक लंबा चला जाता है । जंतुओं, पक्षियों, कीड़ों आदि के शरीर में सिर से आरंभ मानकर सबसे अंतिम या पिछला भाग । पुच्छ । लांगूल । दुम । विशेष—भिन्न भिन्न जीवों की पूँछें भिन्न भिन्न आकार की होती हैं । पर सभी की पूँछें उनके गुदमार्ग के ऊपर से ही आरंभ होती हैं । सरीसृप वर्ग के जीवों की पूँछें रीढ़ की हड्डी की सीध में आगे को अधिकाधिक पतली होती हुई चली जाती हैं । मछली की पूँछ उसके उदरभाग के नीचे का पतला भाग हैं । अधिकांश मछलियों की पूँछ के अंत में पर होते हैं । पक्षियों की पूँछ परों का एक गुच्छा होती है जिसका अंतिम भाग अधिक फैला हुआ और आरंभ का संकुचित होता है । कीड़ों की पूँछ उनके मध्य भाग के और पीछे का नुकीला भाग हैं । भिड़ का डंक उसकी पूँछ से ही निकलता है । स्तन- पायी जंतुओं में से कुछ की पूँछ उनके शेष शरीर के बराबर या उससे भी अधिक लंबी होती है, जैसे लंगुर की । इस वर्ग के प्रायः सभी जीवों की पूँछ पर बाल नहीं होते; रोएँ होते हैं । हाँ किसी किसी की पूँछ के अंत में बालों का एक गुच्छा होता है । पर घोड़े की पूँछ पर सर्वत्र बड़े बड़े बाल होते हैं । मुहा॰—(किसी की) पूँछ पकड़कर चलना = (१) किसी के पीछे पीछे चलना । किसी का पिछुआ या पिछलग्गू बनना । हर बात में किसी का अनुगमन करना । बेतरह अनुयायी होना (व्यंग्य) । (२) किसी के सहारे से कोई काम करना । सहारा लेना या पकड़ना । किसी विषय में किसी की सहायता पर निर्भर होना (व्यंग्य) । पूँछ दबाना = बहुत ही विनीत या अधीन भाव दिखाना । उ॰—दुबरी कानौ हीन सुवन बिन पूँछ दवाए ।—ब्रज॰ ग्रं॰, पृ॰ ११० । पूँछ बिलौअल = चापलूसी । मीठी मीठी बातें कहना । उ॰—संपादक महाशय पूछहिलौअज कर सुनी बात अनसुनी करना चाहते थे ।—प्रेमघन॰, भा॰ २, पृ॰ २३ । बड़ी पूँछ का आदमी = बहुत अधिक संमानित । इज्जतदार । उ॰—एक बोला वह बड़ी पूँछ के आदमी हैं । दूसरे ने कहा अच्छी बे पर की उड़ाई ।—फिसाना॰, भा॰ ३, पृ॰ ५०७ ।

२. किसी पदार्थ केः पीछे का भाग ।

३. पिछलग्गू । पुछल्ला । जो किसी के पीछए या साथ रहे । मुहा॰—(किसी की) पूँछ होना = पुछल्ला बनना । पिछलग्गू बनना । अंधानुयायी होना ।