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पूर्णपात्र

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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पूर्णपात्र संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. पूरा पात्र । भरा हुआ पात्र ।

२. पुत्रजन्मादि के उत्सव के समय पारितोषिक या इनाम के रूप में मिले हुए वस्त्र, अलंकार आदि ।

२. सुसंवाद लानेवालों को मिलनेवाला उपहार । अच्छी सूचना लाने पर मिलनेवाला पुरस्कार ।

४. वह घड़ा जो प्राचीन काल में चावलों से भरकर होम या यज्ञ के अंत में ब्रह्मा को दक्षिणा रूप में दिया जाता था । इसमें साधारणतः २५६ मुट्ठी चावल हुआ करता था ।