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पेलना

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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पेलना ^१ क्रि॰ स॰ [सं॰ पीड़न]

१. दबाकर भीतर घुसाना । जोर से भीतर ठेलना या धँसाना । दबाना । उ॰—विपति हरत हठि पद्मिनी के पात सम, पंक ज्यौं पताल पेलि पठवै कलुष को ।—केशव (शब्द॰) ।

२. ढकेलना । धक्का देना । उ॰—(क) गिरि पहाड़ पर्वत कहँ पेलहिं । बृक्ष उचारि झारि मुख मेलहिं ।—जायसी (शब्द॰) । (ख) स्वामि काज इंद्रासन पेलों ।—जायसी (शब्द॰) ।

३. टाल देना । अवज्ञा करना । उ॰—(क) जो न कियो परिनै पन पेलि, पषाण परै पुहुमीपति के पन ।—रघुराज (शब्द॰) । (ख) भोरेहु भरत न पेलिहहिं, मन सहुँ राम रजाइ । करिय न सोच सनेह बस, कहेउ भूप बिलखाइ ।—तुलसी (शब्द॰) । (ग) जनक सुता परिहरी अकेली । आयहु तात वचन मम पेली ।— तुलसी (शब्द॰) । (घ) प्रभुपितु बचन मोह बस पेली । आयउँ यहाँ समाज सकेली ।—तुलसी (शब्द॰) ।

४. त्यागना । हटाना । फेकना । उ॰—राज महाल को बालक पेलि कै पालत लालत खूसर की ।—तुलसी (शब्द॰) ।

५. जबरदस्ती करना । बल प्रयोग करना । उ॰—कह्यौ युवराज बोलि बानर समाज आज खाहु फल सुनि पेलि पैठे मधुबन में ।—तुलसी (शब्द॰) ।

६. प्रविष्ट करना । घुसेड़ना ।

७. गुदामैथुन करना । (बाजारू) ।

८. दे॰ 'पेरना' ।

पेलना ^२ क्रि॰ स॰ [सं॰ प्रेरणा]

१. आक्रमण करने के लिये सामने छोड़ना । ढीलना । आगे बढ़ाना । उ॰—(क) कुंभ- स्थल कुच दोउ मयमंता । पैलो सौहँ सँभारहु कंता ।— जायसी । (शब्द॰) (ख) जौं लहि धवहिं ऊसका खेलहु । हस्तिहिं केर जूह सब पेलहु ।—जायसी (शब्द॰) । (ग) (इतनी) बात के सुनते ही गजपाल ने गज पेला, ज्यौं वह बलदेव जी पर टूटा, त्यौं उन्होंने हाथ घुमाय एक थपेड़ा ऐसा मारा...... ।—लल्लू (शब्द॰) ।

२. पु बिताना । गुजारना । उ॰—आतिथ्य विनय विवेक कौतुक समय पोल्लिअ सब्बहिं ।—कीर्ति॰, पृ॰ २८ ।

३. भेजना । पठाना । उ॰— मैं मेले रे मैं मेले । परचंड दसूं दिस पेले ।—रघु॰ रू॰, पृ॰ १५६ ।