पोना
प्रकाशितकोशों से अर्थ
[सम्पादित करें]शब्दसागर
[सम्पादित करें]पोना ^१ क्रि॰ स॰ [सं॰ पूप, हिं॰ पूवा+ना (प्रत्य॰)] गीले आटे की लोई को हाथ से दबा दबाकर घुमाते हुए रोटी के आकार में बढाना । गीले आटे की चपाती गढना । जैसे, आटा पोना, रोटी पोना ।
२. रोटी पकाना । उ॰— (क) तुमहिं अबै जैइँय घर पौई । कमल न भेंटहिं, भेंटहिं कोईं । — जायसी (शब्द॰) । (ख) सूर आँखि मजीठ कीनी निपट काँची पोय ।—सूर (शब्द॰) ।
पोना ^२ क्रि॰ स॰ [सं॰ पोत, प्रा॰ पोइअ, हिं॰ पोय+ ना (प्रत्य॰)] पिरोना । गुथना । पोहना । उ॰— (क) हरि मोतियन की माल है पोई काँचे धाग । जतन करो झटका घना टूटे की कहुँ लाग ।—कबीर (शब्द॰) । (ल) कंचन को कँठुला मनि मोतिनि बिच बधनहँ रह्यौ पोइ (री) । देखत बनै, कहत नहिं आवै उपमा कौं नहिं कोइ (री) । —सूर॰, १० ।१४८ । (ग) दिनकर कुज मनि निहारि प्रेम मगन ग्राम नारि परसपर कहैं सखि अनुराग ताग पोऊ । तुलसी यह ध्यान सुधन जा दिन मानि लाभ सधन कृपन ज्यों सनेह सोहिए सुगेह जोऊ ।— तुलसी (शब्द॰) ।
पोना ^३ संज्ञा पुं॰ [हिं॰] दे॰ 'पौना' ।