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पोस्ता

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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पोस्ता संज्ञा पुं॰ [फा़॰ पोस्त] एक पौधा जिसमें से अफीम निकलती है । विशेष—यह पौधा दो ढाई हाथ ऊँचा होता है । पत्तियाँ भाँग या गाँजे की पत्तियों की तरह कटावदार पर बहुत बडी़ और सुंदर होती हैं । डंठलों में रोइयाँ सी होती हैं । फागुन चैत में पौधा फूलने लगता है । पौधे के बीचोबीच से एक लंबी पतली नाल (डंठी) ऊपर की ओर जाती है जिसके सिरे पर चार पाँच पँखड़ियों का कटोरे के आकार का बहुत सुंदर गोल फूल लगता है । फारस और हिंदुस्तान में जो पोस्ता बोया जाता है उसका फूल भी सफेद और बीज के दाने भी सफेद होते हैं । पर रूम के राज्य में जो पोस्ता होता है उसके फूल प्याजी रंग के और दाने काले होते हैं । बहुत चटकीले लाल फूलवाले पौधे को ही 'गुलेलाला' कहते हैं जिसकी सुंदरता का फारसी के कवियों ने इतना वर्णन किया है और जो शोभा के लिये बगीचों में लगाया जाता है । फूल के बीच में एक घुंडी सी होती है जिसमें इधर उधर की किरनों के सिरों पर पुं॰ पराग होता है । पंखड़ियों के झड़ जाने पर घुंडी बढ़कर डोडे (ढेंढ) के रूप में हो जाती है । इसी को पोस्ते का डोडा या ढेढ़ कहते है । डोडा तीन चार अंगुल का होता है । डोडे के कुछ बढ़ जाने पर उसमें लोहे की नहरती से खडा़ चीरा या पाँछ लगा देते हैं । पाँछ लगने से उसमें से हलके गुलाबी रंग का दूध निकलता है जो दूसरे दिन लाल रंग का होकर जम जाता है । यही जमा हुआ दूध अफीम है । एक डोडे से तीन चार बार दूध पोंछकर निकाला जा सकता है । फूल की पखड़ियों को भी लोग मिट्टी के गरम तवे पर इकट्ठा करके गोल रोटी के रूप में जमाते हैं जिसे पत्तर कहते हैं । सूखे डोडों से राई के से सफेद सफेद बीज निकलते हैं जो पोस्ते के दाने कहलाते हैं और खाए जाते हैं । पोस्ते की जाति के २५ या २६ पौधे होते हैं । पर उनमें से अफीम नहीं निकलती । वे शोभा के लिये बगीचों में लगाए जाते हैं ।