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पोहना

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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पोहना ^१ † क्रि॰ स॰ [सं॰ प्रीत, प्रा॰ पोइअ हिं॰ पोय + ना (प्रत्य॰)]

१. पिरौना । गूँथना । उ॰—(क) लटकन लटकि रहे मुख ऊपर पँचरंग मणिगण पोहे री । मानहुँ गुरु शनि शुक्र एक ह्वै लाल भाल पर तोहे री ।—सुर (शब्द॰) । (ख) जुगुति बेधि पुनि पोहियहि रामचरित बर नाग । पहिरहिं सज्जन विमल उर सोभा अति अनुराग ।—तुलसी (शब्द॰) ।

२. छेदना । उ॰—इक एक सिर सरनिकर छेदे नभ उड़त इमि सोहहीं । जनु कोवि दिनकर करनिकर जहँ तहँ विधुंतुद पोहहीं ।—तुलसी (शब्द॰) ।

३. लगाना । पोतना । उ॰—भरोसो कान्ह को है मोहिं । सुनहि जशोदा कस तपति भय तू जनि ब्याकुल होढि । पहिलैं पूतना कपट रूप करि आइ स्तनवि विष पोहि । वैसी प्रबल सुद्वै दिन बालक मारि दिखायौ तोहि ।—सूर॰, १० ।२९७६ ।

४. जड़ना । घुसाना । धँसाना । जमाना । उ॰—अब जानी पिय बात तुम्हारी । मों सों तुम मुख ही की मिलवत भावत ि है वह प्यारी ।......भली करी यह बात जनाई प्रगट दिखाई मोहिं । सूर श्याम यह प्रान पियारी उर मैं राखी पोहि ।—सूर॰, १० । २४१३ । (ख) कै मधुपावलि मंजु लसै अरविंद लगी मकरंदहि पाहे ।—बेनी (शब्द॰) ।

५. पीसना । घिसना ।

६. दे॰ 'पोना' ।

पोहना ^२ वि॰ [स्त्री॰ पोहनी] घुसनेवाला । भेदनेवाला । उ॰— यह चार अंग सी सोहनी, चार सैन्य मधि पोहनी । जुग चार चार श्रुति में विदित मृत्युपास मनमोहनी ।—गोपाल (शब्द॰) ।