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प्रत

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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प्रत † अव्य॰ [हिं॰] दे॰ 'प्रति' । उ॰—श्री राजा धृतराष्ट्र संजे प्रत पूछत है ।—पोद्दार अभि॰ ग्रं॰, पृ॰ ४८३ ।

प्रत ^१ वि॰ [सं॰] मृत । मरा हुआ । गतप्राण [वि॰] ।

प्रत ^२ संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. मरा हुआ मनुष्य । मृतक प्राणी ।

२. पुराणानुसार वह कल्पित शरीर जो मनुष्य को मरने के उपरांत प्राप्त होता है । विशेष—पुराणों में कहा है कि जब मनुष्य मर जाता है और उसका शरीर जला दिया जाता है तब वह अतिवाहिक या लिंग शरीर धारण करता है; और जब उसके उद्देश्य से पिंड आदि दिया जाता है, तब उसे प्रेत शरीर प्राप्त होता है । इसी प्रेत शरीर की भोग शरीर भी कहते हैं । यह शरीर मरने के उपरांत सपिंडी होने तक रहता है । और तब वह अपने कर्म के अनुसार स्वर्ग या नरक में जाता है । जिन लोगों की श्राद्ध आदि या ऊर्ध्व दैहिक क्रिया नहीं होती, वे प्रेतावस्था में ही रहते हैं । कुछ लोग अपने कर्म के अनुसार ऊर्ध्व दैहिक क्रिया हो जाने पर भी प्रेत ही बने रहते हैं । पुराणों में यह भी कहा है कि जो लोग आहुति नहीं देते, तीर्थ- यात्रा नहीं करते, विष्णु की पूजा नहीं करते, दान नहीं देते, पराई स्त्री हर लाते हैं, झूठे या निर्दय होते हैं, मादक पदार्थों का सेवन करते हैं, अथवा इसी प्रकार के और कुकर्म करते हैं, वे प्रेत होकर सदा दुःख भोगते हैं । यह भी कहा गया है कि प्रेतों का निवास मल, मूत्र आदि गंदे स्थानों में रहता है और वे निर्लज्ज होते तथा अपवित्र पदार्थ खाते हैं ।

३. पितर (को॰) ।

४. नरक में रहनेवाला प्राणी ।

५. पिशाचों की तरह की एक कल्पित देवयोनि जिसके शरीर का रंग काला, शरीर के बाल खडे़ और स्वरूप बहुत ही विकराल माना जाता है । यौ॰—भूत प्रेत ।

६. भयँकर आकृतवाला व्यक्ति । वह व्यक्ति जिसकी आकृति विकराल हो ।

७. वह व्यक्ति जो बिना थके लगातार काम करता जाय ।

८. बहुत ही चालाक और कंजूस आदमी ।