फँदाना

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

फँदाना ^१ क्रि॰ सं॰ [हिं॰ फंदना] फंदे में लाना । जाल में फंसाना । उ॰—(क) लसत ललित कर कमलमाल पहिरावत । काम फंद जनु चंदहि बनज फँदावत ।—तुलसी (शब्द॰) । (ख) मेरै माई लोभी नैन भए । कहा करौं ये कह्यौ न मानत बरजत ही जु गए । रहत न घूँघट ओट भवन में पलक कपाट दए । लए फँदाइ विहंगम झानों मदन ब्याध बिधए ।—सूर॰, १० । २२९८ । (ग) अलक डोर मुख छबि नदी बेसर बंसी लाई । दै चारा मुकतानि को मो चित चली फँदाई ।—मुबारक (शब्द॰) । (घ) जीवहिं राखे फंद फंदाई । शब्द बान महँ मारो जाई ।— कबीर सा॰, पृ॰ ८३१ ।

फँदाना पु ^२ क्रि॰ अ॰ [हिं॰ फंदना] फँसना । फंदे में आना ।

फँदाना ^३ क्रि॰ सं॰ [सं॰ स्पन्दन, फन्दन] उछालना । कुदाना । फाँदने का काम दूसरे से करना । उ॰— उनके पीछे रथों के ताँते दृष्टि आते थे, उनकी पीठ पर घुड़चढ़ों के यूथ के यूथ वर्ण वर्ण के घोड़े गोटे पट्टे वाले गजगान पाखर डाले, जमाते ठहराते नचाते कुदाते, फँदाते ले जाते थे ।— लल्लू (शब्द॰) ।

फँदाना पु † ^४ क्रि॰ सं॰ [हि॰ फानना का प्रे॰ रूप] तैयार कराना । सजवाना । उ॰—(क) जल्दी से डोलिया फँदाय माँगे बलमु ।— कबीर॰ श॰, भा॰ २ पृ॰ १०४ । (ख) राँध परोसिनि भेंटहूँ न पायों, डोलिया फँदाए लिए जात हो ।— घरनी॰, पृ॰ ३४ । (ग) सत गुरु डोलिया फँदावल लगें चार कहार हो ।— धरनी॰, पृ॰ ४७ ।