फरिया
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प्रकाशितकोशों से अर्थ
[सम्पादित करें]शब्दसागर
[सम्पादित करें]फरिया ^१ संज्ञा स्त्री॰ [हिं॰ फरना]
१. वह लहँगा जो सामने की ओर सिला नहीं रहता । उ॰— औचक ही देखे तहँ राधा नयन विशाल बाल दिए रोरी । नील बसन फरिया कटि पहिरे बेनी पीठ रुचिर झकझोरी ।— सूर (शब्द॰) । विशेष— यह कपडे़ का चौकोर टुकड़ा होता है जिसको एक किनारे की ओर चुन लेतेत हैं । इसे स्त्रियाँ वा लड़कियाँ अपनी कमर में बाँध लेती हैं ।
२. ओढ़नी । फरिआ ।
फरिया ^२ संज्ञा पुं॰ [हिं॰ फरना] रहट के चरखे वा चक्कर में लगी हुई वे लकड़ियाँ जिनपर मिट्टी की हँड़ियों की माला लटकती रहती है ।
फरिया ^३ संज्ञा पुं॰ [हिं॰ परी (=मिट्टी का कटोरा)] मिट्टी की नाँद जो चीनी के कारखानों में इसलिये रखी जाती है कि उसमें पाग छोड़कर चीनी बनाई जाय । हौद ।