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फाँस

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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फाँस ^१ संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ पाश]

१. पाश । बंधन । फंदा । उ॰— माया मोह लोभ अरु मान । ए सब त्रय गुण फाँस समान ।—सूर (शब्द॰) ।

२. वह रस्सी जिसका फंदा डालकर शिकारी पशु पक्षी फँसाते हैं । उ॰—(क) दृष्टि रही ठग- लाड़ू, अलक फाँस पड़ गीव । जहाँ भिखारि न बाँचइ तहाँ बँचई को जीव?—जायसी (शब्द॰) । (ख) वरुण फाँस ब्रजपतिहिं छिन माहिं छुड़ावै । दुखित गयंदहि जानि के आपुन उठि घावै ।—सूर (शब्द॰) ।

फाँस ^२ संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ पनस]

१. बाँस, सूखी लकड़ी आदि का कड़ा तँतु जो शरीर में चुभ जाता है । बाँस या काठ का कड़ा रेशा जिसकी नोक काँटे की तरह हो जाती है । महीन काँटा । उ॰—(क) करकि करेजे गड़ि रही वचन वृक्ष की फाँस । निकसाए नकसै नहीं रही सो काहू गाँस ।—कबीर (शब्द॰) । (ख) नस पानन की काढ़ै हेरी । अधर न गड़े फाँस तेहि केरी ।—जायसी (शब्द॰) । क्रि॰ प्र॰—गड़ना ।—चुभना ।—निकलना ।—निकालना ।— लगना ।

२. बाँस, बेंत आदि को चीरकर बनाई हुई पतली तीली । पतली कमाची । उ॰—अमृत ऐसे बचन में रहिमन रस की गाँस । जैसे मिसिरिहु में मिली निरस बाँस की फाँस ।—रहीम (शब्द॰) । मुहा॰—फाँस चुभना=जो में खटकनेवाली बात होना । कसकनेवाली बात होना ।—ऐसी बात होना जिससे चित्त को दुःख पहुँचे । फाँस निकलना=कंटक दूर होना । ऐसी वस्तु या व्यक्ति का न रह जाना जिससे दुःख या खटका हो । कष्ट पहुँचानेवाली वस्तु का हटना । फाँस निकालना=कंटक दूर करना । ऐसी वस्तु या व्यक्ति को दूर करना जिससे कुछ कष्ट या बात का खटका हो ।