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फिटकिरी

विक्षनरी से

प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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फिटकिरी संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ फटिका, स्फटिकारि, फाटकी] एक मिश्र खनिज पदार्थ जो सलफेट आफ पोटाश और सलफेट आफ अलुमीनियग के मिलकर पानी में जमने से बनता है । विशेष—यह स्वच्छ दशा में स्फटिक के समान श्वेत होता है, इसी से इसे स्फटिका या फिटकिरी कहते हैं । मैल के योग से फिटकिरी लाल, पीली और काली भी होती है । यह पानी में घुल जाती है और इसका स्वाद मिठाई लिए हुए बहुत ही कसैला होता है । हिंदुस्तान में बिहार, सिंध, कच्छ और पंजाब में फिटकरी पाई जाती है । सिंधु नदी के किनारे 'कालाबाग' और छिछली घाटी के पास 'कोटकिल' फिटकिरी निकलने के प्रसिद्ध स्थान हैं । फिटकिरी मिट्टी के साथ मिली रहती है । मिट्टी को लाकर छिछले हौजों में बिछा देते हैं और ऊपर से पानी डाल देते हैं । 'अलगीनियम सलफेट' पानी में घुलकर नीचे बैठ जाता है जिसे फिटकिरी का बीज कहते हैं । इस बीज (अलुमीनम सलफेट) को गरम पानी में घोलकर ६ भाग 'सलफट आफ पोटाश' मिला देते हैं । फिर दोनों को आग पर गरम करके गाढ़ा करते हैं । पाँच छह् दिन में फिटकिरी जम जाती है । फिटकिरी का व्यवहार बहुत कामों में होता है । कसाव के कारण इसमें संकोचन का गुण बहुत अधिक है । शरीर में पड़ते ही यह तंतुओं और रक्त की नलियों को सिकोड़ देती है जिससे रक्तस्राव आदि कम या बंद हो जाता है । फिटकिरी के पानी से धोने से आई हुई आँख भी अच्छी होती है । वैद्यक में फिटकिरी गरम, कसैली, झिल्लियों को संकुचित करनेवाली तथा वात, पित्त, कफ, व्रण और कुष्ठ को दूर करनेवाली मानी जाती हैं । प्रदर, मुत्रकृच्छ, वमन, शोथ, त्रिदोष और प्रमेह में भी वैद्य इसे देते हैं । कपड़े की रँगाई में तो यह बड़े ही काम की चीज है । इसमें कपड़े पर रंग अच्छी तरह चढ़ जाता है । इसीसे कपड़े को रँगने के पहले फिटकिरी के पानी में बोर देते हैं जिसे जमीन या अस्तर देना कहते है । रंगने के पीछे भी कभी कभी रंग निखारने और बराबर करने के लिये कपड़े फिटकिरी के पानी में बोरे जाते हैं ।